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Monday, March 7, 2016

JNU का साच : षडय़ंत्र की परतें










राजेंद्र शर्मा

जेएनयू में छात्रों के एक ग्रुप के 9 फरवरी के जिस आयोजन के नाम पर, मोदी सरकार और संघ परिवार ने अपने सभी विरोधियों और सबसे बढ़कर वामपंथ को देशद्रोही दिखाने की जबर्दस्त मुहिम छेड़ी है, उस आयोजन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। बेशक, इस क्रम में अफजल गुरु की फांसी की सजा के विरोध को जिस तरह देशद्रोह बनाने की कोशिश की गई है, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार के नारे लगाने भर को राजद्रोह नहीं माना जा सकता है। वास्तव में इस संबंध में तो देश का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्टï राय दे चुका है और बाकायदा हिंसा के लिए फौरी उकसावे की शर्त लगा चुका है। फिर भी, उक्त आयोजन को लेकर सरकार समेत संघ परिवार की ''देशद्रोह के नमूनेÓÓ की निर्मिति खुद गंभीर संदेहों के घेरे में है। इन संदेहों के दो-तीन तत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला, तथ्य जो खासतौर पर दिल्ली सरकार द्वारा कराई गई पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच से सामने आया है, यह है कि उक्त आयोजन के लिए दो टेलीविजन चैनलों के कैमरों को विशेष रूप से और निजी तौर पर बुलाया गया था। इनमें से एक चैनल को तो बाद में उक्त कार्यक्रम की रिकार्डिंग के साथ छेड़छाड़ कर के कन्हैया के मुंह से नारे लगवाने वाला फर्जी वीडियो बनाने के लिए, रंगे हाथों पकड़ा भी गया है। यह दूसरी बात है कि भाजपा सरकार के आशीर्वाद से इसके बावजूद, इस चैनल को कोई नोटिस तक नहीं मिला है, फिर दूसरों को वीडियो के साथ फर्जीवाड़ा न करने का सबक देने वाली कोई सजा दिए जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। विश्वविद्यालय सिक्युरिटी के परिसर में प्रवेश के रिकार्ड के अनुसार, इन चैनलों को प्रस्तावित आयोजन से काफी पहले और जेएनयू के एबीवीपी नेताओं द्वारा बुलाया गया था।
इससे कम से कम एक बात तो निर्विवाद रूप से साबित हो ही जाती है। 9 फरवरी को जेएनयू में जो कुछ हुआ, स्वत:स्फूर्त नहीं था। उसके लिए कम से कम उन लोगों की तरफ से पूरी तैयारी थी, जिन्होंने बाद में इसे जेएनयू के खिलाफ हमले का हथियार बनाया। क्या टेलीविजन चैनल इस पूर्व-नियोजित टकराव को, संघ-एबीवीपी के पक्ष से दर्ज करने के लिए ही बुलाए गए थे? आखिरकार, 'देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों के युद्घÓ के भोंडे रूपक के प्रचार के जरिए,  इस रिकार्डिंग का जेएनयू के छात्र आंदोलन को बदनाम करने में तो उपयोग किया ही जा सकता था। पहले पुणे फिल्म तथा टेलीविजन इंस्टीट्यूट, फिर मद्रास आईआईटी पेरियार-आंबेडकर स्टडी सर्किल, फिर गैर-नैट छात्रवृत्ति बंद किए जाने के खिलाफ आक्यूपाई यूजीसी और अंतत: रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, हरेक मामले में मोदी सरकार और उसकी शिक्षा मंत्री के कदमों के खिलाफ संघर्ष के अगले मोर्चे पर रहे जेएनयू के वामपंथी छात्र आंदोलन पर अंकुश लगाना जरूरी था।
लेकिन, लगता है कि खेल शायद इससे भी बड़ा था। एबीवीपी के बुलाए वफादार चैनलों की रिकार्डिंग के माध्यम से सत्तापक्ष तथा उसके द्वारा नियंत्रित शासन-प्रशासन के पास, 9 फरवरी को जो कुछ हुआ था, उसकी साक्ष्यों समेत पूरी जानकारी शुरु से ही थी, जिसमें आपत्तिजनक नारे लगाने वालों से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। इसके बावजूद, पहले एबीवीपी व भाजपा सांसद की शिकायत के माध्यम से सिर्फ आपत्तिजनक नारों को उछाला गया और उनके लिए छात्रसंघ के अध्यक्ष व महासचिव समेत, वामपंथी छात्र नेताओं के मुंह में ये नारे रखने की कोशिश की गई। इनका झूठ अब बाकायदा पकड़ा जा चुका है।  लेकिन, कन्हैया की गिरफ्तारी से लेकर अब जमानत पर रिहाई तक, पिछले इतने घटनापूर्ण करीब चार हफ्तों में पुलिस, न सिर्फ उक्त नकाबपोशों को पकड़ नहीं पाई है बल्कि उनकी किसी तरह से पहचान तक नहीं कर पाई है। वास्तव में पुलिस इस सच्चाई को देखकर भी नहीं देखना चाहती है कि कोई बाहरी नकाबपोश थे, जिन्होंने उक्त आपत्तिजनक नारे लगाए थे।
इसका सबसे उदार अर्थ तो यही हो सकता है कि सरकार की और इसलिए उसकी पुलिस की भी दिलचस्पी, वास्तव में न तो उक्त राष्टï्रविरोधी नारों में थी और न उक्त नारे लगाने वालों को देश के कानून के तहत बनने वाली सजा दिलाने में। उनकी दिलचस्पी तो जेएनयू छात्र आंदोलन, जेएनयू और उसके बहाने से विपक्ष तथा विशेष रूप से वामपंथ को देशविरोधी प्रचारित करने में थी और यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। लेकिन, इससे एक और गंभीर आशंका भी पैदा होती है। कहीं मौके पर संघ के वफादार टेलीविजन कैमरों की ही तरह, देश तोडऩे के नारे लगाने वाले नकाबपोशों की उपस्थिति भी प्रायोजित और इसलिए एक बड़े षडय़ंत्र का हिस्सा तो नहीं थी? बेशक, नवउदारवाद के इस जमाने में बार-बार कहकर 'षडय़ंत्र सिद्घांतÓ को इतना बदनाम कर दिया गया है कि ऐसे षडय़ंत्र की ओर इशारा करते हुए भी हिचक होती है। लेकिन, सच्चाई यह है कि दुनिया भर में सत्ताधारी ताकतेें, एजेंट प्रोवेकेटियरों का ऐसा उपयोग करती आई हैं और आज भी कर रही हैं।
वास्तव में इसी बीच सामने आई इशरत जहां प्रकरण को नया रंग देने की सारी कोशिशों के बावजूद, पूर्व-गृह सचिव जीके पिल्लै ने चिदंबरम तथा कांग्रेस को मुश्किल में डालने की कोशिश करते हुए भी, इस पूरे प्रकरण के खुफिया ब्यूरो का एक ''कंट्रोल्ड आपरेशनÓÓ होने की बात मानी है। सुरक्षातंत्र की भाषा के जानकारों के अनुसार, इस मामले में कंट्रोल्ड ऑपरेशन का संक्षिप्त अर्थ है—बहकाकर बुलाना और खत्म कर देना! हालांकि यह सोचकर दहशत होती है, फिर भी सच यही है कि जो खुफिया एजेंसियां एक कॉलेज छात्रा समेत चार लोगों को, उनकी पृष्ठïभूमि कुछ भी हो, फंसाकर षडय़ंत्रपूर्वक मौत के घाट उतार सकती हैं और इससे सत्ताधारी नेताओं की हत्या के षडय़ंत्र को विफल करना प्रचारित कर सकती हैं, क्या एक कार्यक्रम में अपने 'मनचाहेÓ नारे लगवाने के लिए तीन नकाबपोश खड़े नहीं कर सकती हैं? क्या पुलिस इसीलिए उन्हें बचा रही है? मुद्दा नारों के देशद्रोहात्मक या राजद्रोहात्मक होने न होने का नहीं है। मुद्दा इस मुद्दे को इतना तूल देने के बावजूद, ये नारे लगाने वालों की सही पहचान करने से शासनतंत्र के कतराने का है। जब तक उक्त नकाबपोशों की पक्की पहचान नहीं की जाती है और इसी के हिस्से के तौर पर छात्रसंघ के पदाधिकारियों समेत वामपंथी छात्र नेताओं को उक्त नारों से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह संदेह बना ही रहेगा और समय गुजरने के साथ और गहरा होता जाएगा कि कहीं यह भी छात्र आंंदोलन तथा आम तौर पर विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ऑपरेशन उनके लिए अंतत: फायदे का सौदा होगा या घाटे का, यह एक अलग विषय है

देशबंधु

Saturday, March 5, 2016

कन्हैया तो एक झाँकी है .......




सतीश मिश्रा

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘अंकुर’। श्याम बेनेगल की इस फिल्म का आखिरी 5 सेकंड का दृश्य ही पूरी फिल्म की जान था। इसमें पूरा गांव जमींदार के दमन और शोषण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पाता, मानों हर जुल्म सहना उनकी नियति बन गई हो लेकिन आखिरी सीन में भुक्तभोगी दंपती (अनंत नाग व शबाना आजमी) का नन्हा सा बेटा संदेश देता है कि भले ही उसके मां-पिता  ने सloबकुछ सह लिया हो लेकिन अब नई पीढ़ी यह बर्दाश्त नहीं करेगी और पहला पत्थर उस जमींदार के अभेद्य दुर्ग पर फेंककर उसकी खिड़की का कांच तोड़ देता है जिसकी ओर देखने की किसी में हिम्मत नहीं थी। इस ऐक्ट में इतना कुछ छिपा था जो शायद वह ढाई घंटे की फिल्म नहीं बोल पाई।
दूसरी आजादी का नारा देनेवाले जयप्रकाश नारायण रहे हों या संपूर्ण क्रांति के पक्षधर राममनोहर लोहिया या फिर सबसे ताजातरीन आंदोलक अन्ना हजारे, हर क्रान्ति का पेट्रोल युवाओं की धमनियों से ही आया है। मेक इन इंडिया के तहत सरकार ने स्टार्ट-अप योजना पेश की थी लेकिन कन्हैया ने तो उसे कुछ अलग ही तरीके से अपनाकर सर जी, का पूरा आइडिया ही खराब कर दिया। एक ही झटके से विडियो-ऑडियो में कट-पेस्ट करनेवालों को पेचिश लग गई। 65% आबादी 35 वर्ष का फॉर्म्युला गिना-गिनाकर सत्ता पाने के बाद क्या उस 35 साल वालों को उसी अनुपात में सत्ता का अधिकार दिया गया? आज जरूरत है कि युवाओं की इस उपस्थिति का एहसास उन्हें फैसला लेने की शक्ति देकर किया जाए।
यह शाश्वत सत्य है कि षड़यंत्रों से युवकों की आवाज कभी दबाई नहीं जा सकती या किसी वर्ग की आवाज दबाकर, उनका माखौल उड़ाकर, तिरस्कार कर और बोलने की आज़ादी की जब कोशिश होगी तब वे उतने ही मुखर बनेंगे। देश इवेंट मैनेजमेंट के सहारे नहीं चलता। वह चलता है भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, समानता और महंगाई को मैनेज करने से। इन मोर्चों पर असफल रहने पर ऐसे ही अरविंदों, राहुलों और कन्हैयों की भरमार होती रहेगी।
कुमार विश्वास की कन्हैया पर बिल्कुल सटीक प्रतिक्रिया थी कि यह छोटा रिचार्ज तो पूरे नेटवर्क को उड़ा देने की क्षमता रखता है। कन्हैया ने सही याद दिलाया कि सीमा पर मारे जानेवाले सैनिक का कभी कोई भाई-भतीजा या रिश्तेदार क्यों राजनीतिज्ञ, मंत्री या बड़े अफसर नहीं निकलता? हर बार उन सैनिकों की शहादत पर उनका ताबूत गांवों-कस्बों में किसान या मध्यवर्ग ही क्यों पहुंचता है? उनकी शहादत पर घड़ियाली आंसू बहानेवाले क्या जाने उस दर्द को?
अभी कुछ महीनों पहले तक तो भक्त यही मान रहे थे कि कांग्रेस की हताशाभरी हार के बाद नेतृत्व पर अगर कोई उंगली उठा सकता है तो वह केवल अरविंद केजरीवाल हैं। लेकिन तब तक शानदार विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ नीतीश कुमार आ धमके। अभी यह जोड़ी बनी थी कि राहुल के नए तेवरों ने ध्यान खींचा और तब तक रोहित वेमुला प्रकरण से दुखी पूरे युवा वर्ग से पंगा ले लिया गया कन्हैया को गिरफ्तार करके। यह एक की गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि उसी 35 की आयुवाले 65% वर्ग से ले ली गई नाराजगी थी।
तमिलनाडु में लिट्टे से सहानुभूति रखनेवाली जयललिता, पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को पनपने दे रहे अकाली दल, कश्मीर में PDP, असम में बोडोलैंड सहित देश में जितने अलगाववादी संगठन है उन सब से सत्ता की खातिर हाथ मिलाना ही क्या राष्ट्रप्रेम है? हीनभावना किसमें है यह देश को बताने की जरूरत है?
राहुल के नेतृत्व क्षमता पर उठे प्रश्न के बदले वास्तव में तो उनकी दाद तो देनी चाहिए कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए विरोध व्यक्त करने के लिए प्रधानमंत्री के अध्यादेश को फाड़ने की हिम्मत की। आज मार्गदर्शक मंडल चिठ्ठी लिखने के अलावा कुछ कर सकता है? कन्हैया की बात में दम है कि लोगों को हीनभावना पर चर्चा महत्वपूर्ण लगती है लेकिन काला धन वापसी, JNU कांड, रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या, हरियाणा के हिंसक जाट आंदोलन, पठानकोट हमला, EPF में टैक्स की बात मन में क्यों नहीं आती?
चलते-चलाते
राष्ट्रप्रेमी चिल्लाने से कोई राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकता। कन्हैया में देशद्रोही तलाशनेवालों सचमुच में राष्ट्रविरोधी पौधा देखना है तो कोई कश्मीर जाकर देखे जहां रोज सैकड़ों युवक मिलेंगे जो खुलेआम भारत के टुकड़े करने का आह्वान करते हैं और तिरंगे को रौंदते/जलाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना है कि यह सब उसी कश्मीर में हो रहा है जहां बीजेपी की सरकार है


#नवभारत टाइम्स

Friday, March 4, 2016

नरेंद्र मोदी और को पीछे छोड़ते हुए कन्हैया कुमार का सोशल मीडिया पर वर्ल्डवाइड ट्रेंड कर जाने के कुछ तो मायने हैं.

कन्हैया जेल से जमानत पर रिहा कर दिये गये. उन पर केंद्र सरकार ने देश से बगावत का इल्जाम लगाया था. कन्हैया के तिहाड़ से निकलते ही जहां जेएनयू समेत पूरे देश में  जश्न का माहौल था वहीं गुरूवार रात होते- होते सोशल मीडिया में हैशटैग कन्हैया कुमार वर्ल्डवाइड ट्रेंड करने लगा.
खास बात यह है कि अमेरिका में उभरते हुए नेता डोनाल्ड ट्रम्प तो ट्रेंड में पीछ छूट ही गये, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में  जोर शोर से दिया गया बजट सत्र का भाषण भी ट्रेंडिंग में पीछे छूट गया.

कन्हैया कुमार की जमानत पर रहिाई की खबर फैलते ही सोशल मीडिया में लाखों लोगो ने अपनी प्रतिक्रिया और कन्हैया के समर्थन में कमेंट करने लगे. भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया, सोशल मीडिया के इस रौ को भांपते हुए मजबूर हुआ और तमाम चैनलों ने अपनी टीम जेएनयू भेज दी जहां कन्हैया की रिहाई का जश्न चल रहा था. इस अवसर पर कन्हैया ने एक घंटे की स्पीच दी और फिर वही नारे लगाये जिन नारों को फेरबदल कर टीवी चैनलों ने देश को सुनाया था- संघवाद से आजादी, मनुवाद से आजादी, मोदी राज से … हम ले के रहेंगे आजादी.
इस भाषण के दौरान कन्हैया ने स्पष्ट किया कि देश के संविधान में उनका पूरा भरोसा है. उन्हें भारत से आजादी नहीं, बल्कि भारत में आजादी चाहिए.
कन्हैया का जेएनयू में दिया गया यह भाषण हजारों की संख्या में लोग शेयर कर रहे हैं. सोशल मीडिया में जो प्रतिक्रियायें आ रही हैं उसमें अधिकतर लोगों का मानना है कि  आरएस, संघवाद, साम्प्रदायिकता, कार्पोरेटवाद के विरोध के प्रतीक के रूप में कन्हैया कुमार नामक युवा मिल गया है

Thursday, March 3, 2016

मुझे देश से नहीं देश में आज़ादी चाहीए : कन्हैया कुमार

कन्हैया कुमार JNU मे

कन्हैया के घर जशन में मोहम्मद मुसलिम और अन्य
जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार गुरुवार शाम तिहाड़ जेल से रिहा हो गए। उन्हें 20 दिन पहले ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कन्हैया को बुधवार के दिन  अदालत ने ज़मानत दी थी। वे जब जेएनयू के परिसर में पहुंचे तो वहां उन्हें छात्रों और शिक्षकों ने उनका ज़ोरदार  स्वागत किया। कन्हैया के स्वागत में बड़ी तादाद में छात्र नारेबाजी कर रहे थे और हाथों में नारे लिखी तख्तियां लिए हुए थे।


कन्हैया ने देर रात कैंपस में भाषण दिया। अपने भाषण में उन्होंने केंद्र सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया। उन्होंने प्रधानमंत्री पर भी निशाना साधा। कन्हैया ने कहा की सरकार जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा हमें भारत से नहीं भारत में आज़ादी चाहीए

उन्होंने अपने भाषण के दौरान भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी याद किया। उन्होंने कहा की उन्हें भारतीय संविधान पर पूरा भरोसा है।  कन्हैया ने अदालत पर भी भरोसा जताया।

आपको बता दें की देशद्रोह के आरोप में 12 फरवरी को कन्हैया की गिरफ्तारी हुई थी। कन्हैया पर आरोप है कि उन्होंने जेएनयू परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में देश विरोधी नारे लगाए थे। कन्हैया ने इस आरोप से बार-बार इनकार किया है।

उधर, दिल्ली सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में नौ फरवरी को आयोजित एक कार्यक्रम में हुई देश-विरोधी नारेबाजी और जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार में कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया है।




Tuesday, March 1, 2016

तीखे तेवर साध कर देश को गुमराह कर रहीं हैं ईरानी : लालु यादव

नई दिल्ली. आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद ने रोहित वेमुला आत्महत्या मामले में केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर करारा वार किया है। लोकसभा में मंत्री के तीखे तेवर पर निशाना साधते हुए लालू ने कहा कि असल में ऐसा कर स्मृति अपनी नाकामयाबियों को छुपा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि शैक्षणिक संस्थानों में संघ की विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है।

लालू यादव ने कहा कि स्मृति ईरानी एचआरडी मंत्री के तौर पर अपनी नाकामयाबी छिपाने की कोशिश कर रही हैं। पूरे देश ने देखा था कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद डॉक्टर मौके पर मौजूद थे। आपको बता दें कि लोकसभा में विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए स्मृति ने कहा था कि रोहित की मौत के बाद डॉक्टरों और पुलिस को भी उसके शव के नजदीक नहीं आने दिया गया था।

लालू यादव ने यहां तक कहा कि स्मृति ईरानी राष्ट्रवाद के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा शैक्षणिक संस्थानों पर थोप रही हैं। लालू यादव ने कहा कि हरियाणा में आरक्षण की मांग पर शुरू हुए जाट आंदोलन के दौरान मुरुथल के पास 10 महिलाओं के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म मामले में बीजेपी सरकार कुछ नहीं कर रही है।

जेएनयू मामले की चर्चा करते हुए लालू यादव ने कहा की जेएनयू पर केंद्र सरकार की नीयत साफ नहीं है। हाल ही में एक बीजेपी विधायक द्वारा जेएनयू कैंपस में कंडोम पाए जाने की बात कहना चौंकाने वाली है। केंद्र अपने हर मोर्चे पर असफल रही है. स्वच्छ भारत अभियान के दौरान एक महिला मंत्री बहुत उत्साहित थीं, ऐसा लग रहा था, मानो वो सड़कों की गंदगी अपने लंबे बालों से साफ करेंगी।

Thursday, February 25, 2016

रोहिथ वेमुला की ख़ुदकुशी पे पकड़ा गया स्मृति इरानी का झूठ,

संसद में रोहित वेमूला सहित जेएनयू मुद्दे पर विपक्ष के आरोपों का बहुत तीखे अंदाज में जवाब देने वाली केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के भाषण को काफी सराहा जा रहा है।

जिस आक्रामक लहजे और तल्‍ख जबान के साथ उन्होंने रोहित और जेएनयू मुद्दे पर विपक्ष के सभी प्रहारों को भोथरा किया उससे प्रधानमंत्री मोदी भी संतुष्ट नजर आए। उन्होंने स्मृति की तारीफ करते हुए ट्वीटर पर उनका पूरा भाषण शेयर भी किया।

लेकिन लोकसभा में स्मृति ईरानी जिन दावों के आधार पर विपक्ष पर भारी पड़ती नजर आई थी अब उन दावों पर ही सवालिया निशान खड़ा हो गया है। सवाल खड़ा करने वाले हैं रोहित के दोस्त जो उसकी मौत के बाद मौके पर ही मौजूद थे।

नए दावों के बाद स्मृति के साथ साथ तेलंगाना पुलिस भी सवालों के घेरे में आ गई है, क्या उसने हाइकोर्ट को गलत जानकारी दी। क्योंकि उसी जानकारी के आधार पर ही स्मृति ने रोहित की मौत को लेकर संसद में नए खुलासे किए थे।

लोकसभा में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते समय बुधवार को स्मृति ईरानी ने कुछ नए तथ्यों का खुलासा किया था। स्मृति ने तेलंगाना पुलिस की हाइकोर्ट में दी गई रिपोर्ट के आधार पर कहा था कि पुलिस को उसकी मौत की जानकारी 17 जनवरी की शाम 7.20 पर मिल गई थी।

जिसके बाद पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची तो देखा की उसका कमरा खुला हुआ था। रोहित का शव भी फंदे से उतारकर नीचे मेज पर रखा हुआ था। स्मृति ने पुलिस के दस्तावेजों के आधार पर दावा किया कि आक्रोशित छात्रों ने पुलिस को उसके शव के नजदीक ही नहीं जाने दिया।

दावा ये भी था कि सुबह 6.30 तक पुलिस और डॉक्टर रोहित के शव की जांच नहीं कर सके। नए दावे के साथ स्मृति ने सवाल खड़ा किया था कि उस भीड़ में ऐसा कौन था जिसने बिना किसी चिकित्सकीय परीक्षण के रोहित को मृत घोषित कर दिया।

स्मृति ने कहा जानबूझकर राजनीति करने के लिए एक छात्र को मौत के मुंह में धकेल दिया गया। राजनीतिक दलों ने उसके शव को भी पॉलीटिकल टूल की तरह इस्तेमाल किया।
स्मृति ने अपने दावों के साथ बेशक विपक्ष पर बढ़त बनाने का प्रयास किया हो लेकिन रोहित के साथियों ने इस पर सवाल खड़ा कर दिया है। रोहित के साथी रहे एक छात्र जिकुरल्लाह निशा ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट लिखते हुए स्मृति इरानी को झूठा कहा है।

निशा ने कहा कि “रोहित के फांसी खाने के तुरंत बाद उसने खुद हेल्‍थ सेंटर को फोन किया था। पांच मिनट के अंदर ही हेल्‍थ सेंटर के सीएमओ डा. राजश्री पी मौके पर पहुंचे और रोहित के शव की जांच कर उसे मृत घोषित किया।

उन्होंने दावा किया कि उस समय तेलंगाना पुलिस भी मौके पर मौजूद थी। आज केन्द्रीय मंत्री ने पूरे देश के सामने झूठ बोला कि सुबह 6.30 बजे तक न पुलिस और न डॉक्टरों को रोहित के शव का निरीक्षण करने दिया गया।” निशा की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रही है।

वहीं एक अंग्रेजी वेबसाइट द न्यूज मिनट ने रोहित के शव का चिकित्सकीय परीक्षण करने वाले डॉक्टर विजयश्री पी के हवाले से बताया कि किया कि उसकी मौत के तुरंत बाद वह के पर पहुंच गए थे।

वेबसाइट के अनुसार रोहित ने 17 जनवरी की शाम 6.30 बजे से 7 बजे के बीच न्यू रिसर्च स्कॉलर हॉस्टल के कमरा नंबर 207 में फांसी खाई थी। इसकी सूचना सबसे पहले सिक्योरिटी ऑफिसर को मिली, जिन्होंने तुरंत हैदराबाद यूनिवर्सिटी के मेडिकल ऑफिसर विजयश्री पी को सूचना दी।
डॉक्टर ने बताया कि मुझे 7.20 पर इसकी सूचना मिली और दस मिनट के अंदर मैं वहां पहुंच गया। तब तक उसके शव को पंखे से उतारकर नीचे रख दिया गया था।� दस मिनट तक जांच करने के बाद हमने उसे मृत घोषित कर दिया। हमनें इस संबंध में तत्काल वीसी को भी सूचित किया।

उन्होंने हमसे पूछा कि क्या उसके जिंदा होने की कोई गुंजाइश है। डॉक्टर के अनुसार सुबह 3 बजे तक वह वहां रहे। डा. विजयश्री ने यूनिवर्सिटी की हेल्‍थ बुक में भी इसका जिक्र किया है। इसमें बताया गया है कि उन्होंने इस संबंध में तुरंत कुलपति, कुलसचिव और डीएसडब्लू को भी इस संबंध में सूचित किया।

वेबसाइट के अनुसार डा. विजयश्री ने बताया कि जिस समय वह मौके पर पहुंचे पुलिस वहां मौजूद थी। वेबसाइट ने एक अन्य सीएमओ रवीन्द्र कुमार के हवाले से बताया कि, मेरे ड्यूटी डॉक्टर विजयश्री सूचना मिलने के तुरंत बाद मौके पर पहुंच गए थे।

जब उनकी मौत की सूचना पुख्ता हो गई तो मैंने वीसी को फोन किया, लेकिन उन्होंने मेरे फोन का जवाब नहीं दिया।� वहीं रोहित के साथ ही सस्पेंड होने वाले चार छात्रों में से एक दोंथा प्रशांत ने बताया कि हम सभी उस समय मौके पर मौजूद थे जब रोहित का शव फांसी पर लटका पाया गया। ड्यूटी डॉक्टर विजयश्री तुरंत मौके पर पहुंचे और उसकी जांच की।

(साभार:headline24.in

Tuesday, February 23, 2016

JNU विवाद पर नया खुलासा, नहीं लगे 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे


नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में नारेबाजी के मामले में दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में नया खुलासा हुआ हैै। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेएनयू र्यक्रम के दौरान कुल 29 नारे लगाए गए, लेकिन 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा नहीं लगा था।
सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने जेएनयू में हुए मामले में कुल 12 पेज की एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में 29 नारों का चर्चा है, लेकिन ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे का जिक्र नहीं है।
वहीं, देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद और उसके चार साथियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत की अर्जी दी है। बताया जा रहा है कि वे प्रोटेक्शन में सरेंडर की रिक्वेस्ट करेंगे।
यहां पर याद दिला दें कि जेएनयू कैंपस में 9 फरवरी की रात को संसद पर हमले के दोषी आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई और इस मौके पर देश विरोधी नारे भी लगाए गए। आरोप है कि यहां पर कुछ छात्रों ने पाकिस्तान जिंदाबाद जैसे देशद्रोही नारे लगाए थे।
अब इस मामले में डिप्टी कमिशनर ऑफ पुलिस (साउथ) प्रेमनाथ ने अपनी जांच रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अफजल की बरसी के दौरान कार्यक्रम में कई तरह के नारे गूंजे थे, लेकिन पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा नहीं गूजा था।
जांच रिपोर्ट में प्रत्यक्षदर्शी भी शामिल हैं, जिनमें विश्वविद्यालय के छात्र और स्टाफ शामिल हैं। गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने 12 फरवरी को एक निजी टेलीविजन चैनल की फुटेज के आधार पर एक मामला दर्ज किया था। हैरानी की बात यह है कि इस वीडियो में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी थे

दैनिक जागरण

Monday, February 22, 2016

'जेएनयू की जिस छात्रा की पुलिस को तलाश, वह है बिहार के भोजपुर की शान

चिंटू कुमारी 

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में देश विरोधी नारे लगने की घटना के बाद दिल्ली पुलिस पूछताछ के लिए छात्रसंघ की जिस पूर्व जनरल सेक्रटरी चिंटू कुमारी की तलाश कर रही है, वह भोजपुर जिले स्थित कोलोडिहरी गांव के हरिजन टोला की शान हैं।

चिंटू जब पढ़ाई के लिए दिल्ली आई थीं तब इसमें सीपीआई(एम-एल) ने काफी मदद की थी। बाद में उनका दाखिला जेएनयू में हुआ जहां वह एमफिल कर रही हैं। 20 साल की चिंटू 2014 में ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स असोसिएशन (आईसा) के टिकट पर छात्रसंघ का चुनाव लड़कर जनरल सेक्रटरी बनी थीं।

चिंटू के पैरंट्स आईसा के पैरंट ऑर्गनाइजेशन सीपीआई (एम-एल) के सदस्‍य हैं। बिहार में जब जातिवाती हिंसा का खूनी दौर चल रहा था और रणवीर सेना ने 1996 में जब बथानी टोला नरसंहार को अंजाम दिया था तब उनके पिता रामलखन ने छिपकर अपनी जान बचाई थी। मजदूरी में बढ़ोतरी की मांग को लेकर वह खेतिहर मजदूरों के आंदोलन का नेतृत्‍व कर चुके हैं जिसकी वजह से ऊपरी तबके के लोगों में उनके खिलाफ गुस्‍सा था।


चिंटू की मां सरोजिनी रोजी-रोटी के लिए चूड़‍ियां बेचने का काम करती हैं। वहीं उनसे छोटी दो बहनें सीपीआई (एम-एल) की मदद से ही दिल्‍ली में पढ़ाई कर रही हैं। उनके भाई संदीप आरा के सीपीआई(एम-एल) दफ्तर में ही रहते हैं और कॉलेज की पढ़ाई कर रहे हैं।

जब सरोजिनी को जेएनयू की घटना के बारे में पता चला तो वह काफी परेशान हो गईं। अपनी बेटी को देशद्रोही करार दिए जाने से वह काफी दुखी हैं। उन्‍होंने कहा, 'हमने सिर्फ यही चाहा कि हमारे बच्‍चे पढ़-लिख जाएं ताकि वे देश की सेवा कर सकें। हमने यह कभी नहीं चाहा कि वे कमाकर हमें खिलाएं या फिर हमारे लिए घर बनवाएं।' सरोजिनी ने कहा कि उनका परिवार तहेदिल से लेफ्ट विचारधारा को मानता है, लेकिन वे देशद्रोही नहीं हैं।

सरोजिनी ने अपनी बेटी को देशद्रोही करार दिए जाने के लिए केंद्र सरकार को जिम्‍मेदार ठहराया। जब चिंटू के सरेंडर करने की बात पूछी गई तो उन्‍होंने सवाल खड़े किए और पूछा कि उसे सरेंडर क्‍यों करना चाहिए। उन्‍होंने कहा, 'वह इसलिए सरेंडर करे ताकि भगवा ब्रिगेड से जुड़े काले कोट वाले लोग पुलिस के सामने उसकी पिटाई करें जैसा कि उसके दोस्‍त कन्‍हैया कुमार की हुई।' एनबीटी

Saturday, February 20, 2016

प्रधानमंत्री को अब देश की जनता को बताना चाहिए कि उनकी नजर में देशद्रोह की परिभाषा क्या है ? :नितीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) मामले में केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साधते हुए कहा कि जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के इतने दिन गुजर जाने के बाद भी पुलिस उसके खिलाफ देशद्रोह का सबूत नहीं जुटा सकी, तो देशद्रेाह का आरोप कैसा? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब देश की जनता को बताना चाहिए कि उनकी नजर में देशद्रोह की परिभाषा क्या है?

नीतीश ने कन्हैया कुमार के खिलाफ सबूत की मांग करते हुए कहा कि भाजपा खुद इस भावनात्मक मुद्दे को उठाकर अन्य मुद्दे को खत्म करना चाहती है। पटना में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के संबंध में पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक प्रश्न पर उन्होंने केन्द्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, भाजपा ने जबरन इस मुद्दे को उछाला है, ताकि लोगों का ध्यान दूसरी ओर ले जाया जा सके। भाजपा विकास के सभी मोर्चे पर विफल साबित हो गई है। अब उसने भावनात्मक मुद्दे को उठाया है जिससे अन्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हट जाए।
उन्होंने कहा कि इतने दिन गुजर जाने के बाद भी कन्हैया के खिलाफ न गृह मंत्रालय और न ही दिल्ली पुलिस सबूत जुटा सकी है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आखिर कोई सबूत तो लाएंगे न? मुख्यमंत्री ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि केन्द्र सरकार जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों को ध्वस्त करना चाहती है। उन्होंने कहा कि जेएनयू में उनकी विचारधाराओं को नहीं मानने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए अपने विचारों को थोपने के लिए ये सब किया जा रहा है।
भाजपा द्वारा बिहार में "जंगलराज" कहे जाने पर भी नीतीश ने हमला बोलते हुए कहा, लोग बिहार में जंगलराज होने का आरोप लगाते हैं, ऐसे लोगों को अब बताना चाहिए कि दिल्ली में पटियाला हाउस अदालत परिसर में पुलिस की मौजूदगी में जो हमले हुए, तो जंगलराज कहां है

Friday, February 19, 2016

JNU विवाद:पूरे बिहार के छात्र एवं युवा कन्हैया के साथ खड़े है-तेजस्वी

पटना। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जेेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पर देशद्रोह के आरोप लगाने के मामले पर बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा है कि देशभक्ति की ठेकेदारी तो केवल केंद्र में बैठे लोगों के पास है, दूसरी पार्टी के लोग तो देशद्रोही हैं। तेजस्वी ने कहा कि यह विचारधारा की लड़ाई है। इसमें किसी पर हमला और न्याय की बात कहां से आ गई? इस बारे में हमें प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है।
इससे पहले तेजस्वी ने सोशल मीडिया पर अपने 'दिल की बात' सीरीज में भाजपा पर जमकर हमला किया। तेजस्वी ने ट्वीट किया, "भाजपाई छद्म राष्ट्रवाद की विफलता को उजागर करने के लिए मै दिल की बात के साथ हाजिर हूं। इसके तहत लेखों को पढकर आप इस बारे में अपनी प्रतिक्रियो दे सकते हैं।"
  "बिहार के कन्हैया कुमार का क्या दोष था? बीजेपी कभी साबित नहीं कर पायेगी।
पूरे बिहार के छात्र एवं युवा कन्हैया के साथ खड़े है।"
अपने अगले ट्वीट में तेजस्वी ने लिखा है कि बीजेपी को युवाओं के डेमोक्रेटिक राइट्स व स्पेस में दखलदांजी नहीं करनी चाहिए।
  "BJP युवाओं के डेमोक्रेटिक राइट्स व स्पेस में दखलदांजी बंद करे अन्यथा जिस दिन इस देश के सारे छात्र एवं युवा एक हो गए आपको कोई ठौर नहीं मिलेगी।"
तेजस्वी ने अपने अगले ट्वीट में भाजपा से कहा है कि आपके स्कूल ऑफ़ थॉट से हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
  "हम देशभक्त है,बाबासाहेब के संविधान व लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं। आपके"स्कूल ऑफ़ थॉट" से हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

Wednesday, February 17, 2016

Inside Story :भाजपा की स्टूडेंट इकाई एबीवीपी में दो फाड़,कन्हैया तिहाड़ जेल के कमरा नंबर तीन में बंद

जेएनयू मामले में एक नया मोड़ आ गया है जिससे भाजपा की मुश्‍किलें बढ़ सकतीं हैं। जेएनयू विवाद को लेकर चल रहे घमासान के बीच भाजपा की स्टूडेंट इकाई एबीवीपी में दो फाड़ हो गया है। खबर है कि एबीवीपी के जेएनयू यूनिट के जॉइंट सेक्रेटरी प्रदीप नरवाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है यहीं नहीं इसके अलावा एसएसएस के एबीवीपी यूनिट के प्रेजीडेंट राहुल यादव और एसएसएस के एबीवीपी यूनिट के सेक्रेटरी अंकित हंस ने भी अपने अपने पद छोड़ दिए हैं। इस बात की जानकारी प्रदीप ने अपनी फेसबुक वॉल के माध्‍यम से दी है।
आपको बता दें कि 9 फरवरी को जेएनयू परिसर में भारत के विरोधी लगे नारों पर लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रिया आई जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों को दो भागों में बंटते देखा गया। एबीवीपी के जेएनयू यूनिट के जॉइंट सेक्रेटरी प्रदीप नरवाल के मुताबिक केंद्र सरकार ने मामले को जिस तरीके से हस्तक्षेप किया है वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया।
इधर, पटियाला हाउस कोर्ट ने सुनवाई के बाद जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को बुधवार को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अब वह दो मार्च तक जेल में रहेंगे। कन्हैया को तिहाड़ की जेल नंबर तीन में कड़ी सुरक्षा में रखा गया है। कन्हैया पर हमले के बाद शीर्ष अदालत को भी इस मामले में दखल देना पड़ा। पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए दिल्ली पुलिस की आयुक्त बीएस बस्सी को तलब किया। निचली अदालत में मचे हंगामे के बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से भेजे गये पांच वकीलों की टीम पर पत्थर फेंके गये। उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए पटियाला हाउस कोर्ट के वकीलों के एक धड़े ने नारेबाजी की। इससे पहले कन्हैया ने पटियाला कोर्ट को दिये बयान में कहा कि कोर्ट परिसर में भीड़ ने उसके साथ मारपीट की।
वहीं, पटियाला हाउस कोर्ट में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान बुधवार दोपहर फिर अराजकता दिखी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार की सुबह 10:30 बजे तक दिल्ली पुलिस से पूरे मामले पर रिपोर्ट देने को कहा है। 18 से भाजपा का ‘जन स्वाभिमान अभियान': देश विरोधी आवाजों को अभिव्यक्ति की आजादी के तौर पर पेश करने और गुमराह करने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए भाजपा गुरुवार से तीन दिवसीय अभियान चलायेगी। 18 से 20 फरवरी तक ‘जन स्वाभिमान अभियान' चलाया जायेगा। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ता धरना देंगे।
तिहाड़ जेल के कमरा नंबर तीन में बंद
कन्हैया ने रिमांड सुनवाई के लिए पेश किये जाने पर मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट से कहा कि मैंने पहले भी कहा है। मैं भारतीय हूं। मुझे देश के संविधान और न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। मेरे विरुद्ध मीडिया ट्रायल पीड़ादायक है। यदि मेरे विरुद्ध सबूत है कि मैं गद्दार हूं, तो कृपया मुझे जेल भेज दीजिए। यदि मेरे खिलाफ सबूत नहीं हैं, तो मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। उसके इस बयान पर पुलिस ने कहा कि वह उसकी जमानत का विरोध नहीं करेगी।
पत्थर फेंके गये गालियां दी गयीं
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद दिल्ली पुलिस पटियाला हाउस कोर्ट में सुरक्षा व्यवस्था कायम करने में नाकाम रही। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से भेजे गये पांच वकील पटियाला हाउस पहुंचे। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट को पटियाला हाउस में हुई घटना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान उस पर हमला हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान रूम खाली करने का आदेश दिया। बाद में सुनवाई रोक दी। फिर वकीलों की टीम ने शीर्ष अदालत को बताया कि मी लार्ड कोर्ट परिसर में हमारे ऊपर बोतल और पत्थर फेंके गये और गालियां भी दी गयीं। इस टीम में कपिल सिब्बल, राजीव धवन, दुष्यंत दवे, एडीएन राव, अजित सिन्हा और हरिन रावल शामिल थे।

JNU : अपना नाकामी छिपाने के लिए खुन का खेल

प्रकाश नारायण सिंह

सियासत के कायदे वही हैं जो राजनीति को रास्ता दिखाएं. जीत के जज्बे को पैदा करने से लेकर सत्ता हथियाने तक धर्म, जाति और ‘राष्ट्रवादी हुंकार’ एक अहम जरिया रहा है.

जब आप जीते थे तो आप सभी की स्याही से सूबे की तकदीर लिखने की उम्मीद थी. आप लोगों की महत्वकांक्षा के नाग ने सच्चे लोकतंत्र को, गरीबी को, भूख को, सुरक्षा को, इंसानियत को, मानवता को डंस लिया. हां, हमारे सियासी मालिक आप ही की बात कर रहा हूं. भय को, भूख को, भ्रष्टाचार को दफनाने के बजाए आप सभी ने हमारी उम्मीदों को दफना दिया. हमने तो आपको अपना हुक्मरान माना, आपको सिर आंखों पर बैठाया, अपनी समस्याओं का समाधान बनाया लेकिन आप उत्पीड़ित अस्मिताओं के निर्मम शोषण का उपकरण बन गए सियासी मालिक.. बताइए ना हमसे चूक कहां हो रही है. समझाइए अब हम क्या करें..

राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट आप तो मत ही दीजिए?

फिलहाल ‘हस्तिनापुर’ की सियासत कठघरे में है. विकास के मुद्दे पीछे छूट गए. धर्म और ‘राष्ट्रवादी हुंकार’ का कॉकटेल बनाया जा रहा है. आम लोगों के मुफलिसी के इस दौर में महंगी आलीशान गाड़ियों में सुरक्षा घेरे के बीच चलना और सियासी शिगूफे छोड़ अपना वर्चस्व साबित करने की कोशिश करना कथित राष्ट्रवादी और धार्मिक ठेकेदारों का अहम पेशा रहा है. ठेकेदारी की ये दुकान छोटी से लेकर बड़ी तक है. जिसकी जैसी दुकान उसकी सियासत में उतनी हिस्सेदारी. विहिप, बजरंग दल से शुरू हुई ये सियासी सेना श्रीराम सेना, ये सेना वो सेना पता नहीं कौन कौन सेना तक बन गई…..आजकल तो हमारे यूपी में तीर धनुष की ट्रेनिंग दी जा रही है आईएसआईएस से लड़ने के लिए.. अरे भाई जब तीर धनुष ही काफी हैं तो भारतीय सेना क्या धान काटेगी? क्या इनको भारतीय सेना पर भरोसा नहीं रहा? खैर.. फिलहाल मुद्दा ये नहीं है.

मैं पहले ही साफ कर दूं कि संविधान के खिलाफ हर नारे का मैं विरोध कर रहा हूं. लेकिन इन नारों के सहारे जो सियासत हो रही है उसे बेहद खतरनाक मानता हूं. बंद करिये सर्टिफिकेट देना.. ये देशद्रोही वो देशद्रोही.. मैं ज्यादा राष्ट्रभक्त.. मैं हिन्दू भक्त.. मैं फलां भक्त.. अरे मैं से बाहर निकलिए और हम के बारे में सोचिए. जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय से रोशनी निकलती है. और रोशनी का वजूद ही अंधेरे के खिलाफ प्रतिरोध है. धर्मांध और कट्टर लोगों के मन में इस विश्विद्यालय के लिए बराबर नफरत क्यों पलती है? शटडाउन जेएनयू का हैशटैग कितना खतरनाक है ये सोचकर ही मन कांप जाता है. राष्ट्रवादी समय में ‘हम’ और ‘वो’ शब्द बेहद शातिरता के साथ इस्तेमाल किए जा रहे हैं. आम लोगों और देश के बीच की रेखा को भी धुंधला किया जा रहा है. बस जो आपके विचार के साथ नहीं है वह देशद्रोही. ये कैसा सर्टिफिकेटवाद है साहब. मेरा सिंगल सवाल.. नारों के मास्टर माइंड को पकड़ने के लिए क्या अब एफबीआई के जवान आएंगे! आपकी रॉ से लेकर दिल्ली पुलिस तक के हत्थे वह क्यों नहीं चढ़ रहा है? दिल्ली पुलिस महज चंद घंटे में जेएनयू के प्रेसिडेंट कन्हैया को गिरफ्तार करती है जिसका नारे लगाते कोई अभी तक वीडियो भी नहीं आया लेकिन जो नारे लगा रहे थे उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. उनको आप गिरफ्तार करने से क्यों बच रहे हैं. हमें पता है कि कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के लिए बन रहे माहौल में दिक्कत आएगी. सत्ता के लिए देशभक्ती का तड़का मत लगाइए. ये आग से मत खेलिए हुजूर.. आपके बच्चे तो ऑक्सफोर्ड में पढ़ते हैं. कमांडों की सुरक्षा के बीच में रहते हैं.. हमारे बच्चे जलेंगे.. मरेंगे.. और कटेंगे.

कानून के रक्षक संस्कृति के रक्षक बन कर पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों के साथ मारपीट की. और उतना ही नहीं आपके विधायक जी तो ऐसे ‘कथित आत्मरक्षा’ में पीटाई करने लगे जैसे मुंबईया डॉन हों. वकीलों की आड में आपके ‘सेवकों’ की करतूत से भारत मां गौरवान्वित होंगी.. क्यों हुई होंगी न.. बोलिये ना.. आप नहीं बोलेंगे क्योंकि आपको उतना ही बोलना है जिससे की सत्ता हथियाने में सफलता मिलती रहे. हमें पता है कि निरंकुश होने की चाह वाली किसी भी सत्ता की आंख में सबसे पहले पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी ही खटकते हैं. क्योंकि यही वे लोग हैं जो सत्ता की पोल खोलते हैं. जनता की आवाज को सत्ता के गलियारे में शोर बनाते हैं. और मधुर संगीत के साथ सोमरस में डूबी मदहोश सत्ता को कर्कश शोर से चिढ़ होती है.

लोकतंत्र का ये हिस्सा भी पढ़ लीजिए!

मुझे तो बस इतनी भर इल्तिजा करनी है कि शोर और चीत्कार के बीच कुछ आवाजें कहीं सहमी और दुबकी हुई हैं. बेआवाज की मानिंद बस उस बेआवाज की आवाज सुन लीजिए. बेशक होंठ सिले नहीं गए हैं लेकिन आपके गुंडों की खौफ से लरज रहे हैं. आप समझ रहे हैं न..आप तो मजलुम के घर पैदा हुए थे. आप गरीब और कमजोर के डर को महसूस कर रहे हैं साहेब.

सुनिए जवाहरलाल नेहरू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया की मां ने कहा है, “हमें जब से पता चला है कि कन्हैया को गिरफ्तार कर लिया गया है, तब से हम लगातार टीवी देख रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि पुलिस उसे बहुत ज्यादा नहीं पीटेगी. उसने कभी भी अपने माता पिता का अपमान नहीं किया, देश की बात तो भूल ही जाइए. कृपया मेरे बेटे को आतंकवादी नहीं बोलिए. वह यह नहीं हो सकता है.” मीना एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं और साढ़े तीन हजार रूपये प्रति माह कमाती हैं. उनके 65 वर्षीय पति लकवाग्रस्त होने की वजह से सात सालों से बिस्तर पर हैं.

आप तो संसद में घुसे तो कैमरे की चमकती रोशनी में माथा टेका. कसम से.. मेरा दिल भर आया. मैं उसे ड्रामा नहीं समझा. चलिए अब आपको कुछ लोकतंत्र का इतिहास दिखाता हूं. देख लीजिएगा चश्मा साफ करके. 1965 में जब अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था, तब अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में ही ऐसे लेक्चर्स की शुरूआत की जिसमें लड़ाई के खिलाफ बातें की जाती थीं. लेकिन उनके इस विरोध को न ही देशद्रोह माना गया और न उन पर कोई कार्रवाई हुई बल्कि यूनिवर्सिटी ने उन्हें उसे जारी रखने की इजाजत दे दी.

1965 से 1973 के बीच पूरे अमेरिका के विश्वविद्यालयों में वियतनाम युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे, छात्रों ने इस दौरान अमेरिकी झंडे भी जलाए. लेकिन तब भी किसी पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं किया गया. सिर्फ उन छात्रों को गिरफ्तार किया गया जो सीधे तौर पर हिंसा में शामिल थे. इसी तरह फरवरी 2003 में इराक युद्ध के खिलाफ भी अमेरिकी विश्वविद्यालयों में छात्रों ने प्रदर्शन किया लेकिन तब भी छात्रों के उस विरोध को देशद्रोह की श्रेणी में नहीं रखा गया.

आर्थिक मुदे पर नाकाम है सरकार?

अब हम आपको बताएंगे कि जेएनयू जैसे विवाद अब रोज आप क्यों चमकाएंगे. खैर चलिए कुछ उस पर आपका ध्यान दिला दूं जो आपको करना था लेकिन किये क्या.. देश की आर्थिक नब्ज बताने वाले शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स फिसलकर उस स्तर से भी नीचे पहुंचा हुआ है, जिस स्तर पर मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी. प्रसिद्ध इतिहासकार राचंद्र गुहा के इस ट्वीट पर ध्यान दीजिए..

The comments by the Home and HRD Ministers on JNU only demonstrate that in this Cabinet, patriotism is the first refuge of the incompetent.

— Ramachandra Guha (@Ram_Guha) February 13, 2016
रुपया भी सबसे निचले स्तर के करीब है. एक डॉलर की कीमत करीब 68 रुपए है. औद्योगिक विकास दर भी लाल निशान दिखा रहा है. मई 2014 में 4.7 फीसदी रहने वाली औद्योगिक विकास दर दिसंबर में माइनस 1.3 फीसदी रही. इस साल आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी का अनुमान भी भी घटाकर सात से साढ़े सात फीसदी के बीच कर दिया गया है. पहले इसके आठ से साढे आठ फीसदी के बीच रहने का अनुमान था. सरकारी बैंकों का बढ़ता घाटा भी मोदी सरकार की मुश्किल बढ़ा रहा है. दिसंबर में खत्म तिमाही में आठ सरकारी बैंकों का घाटा कुल मिलाकर दस हजार करोड़ के पार पहुंच गया है.

सरकार ने पिछले बजट में राजस्व घाटा 3.9 फीसदी तक ले आने का अनुमान रखा था. लेकिन एक तो सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने से उम्मीद से कम कमाई हुई है. वहीं सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के साथ-साथ वन रैंक वन पेंशन के लिए अतिरिक्त प्रावधान करने के मोर्चे पर भी परेशानी है. इसका हल सरकार किस तरह निकालती है, ये तो 29 फरवरी के बजट से साफ हो सकेगा. साल 2015-16 में आयकर और कॉरपोरेट टैक्स जैसे डायरेक्ट टैक्स से कमाई में भी 40 हजार करोड़ की कमी आने का अनुमान है. हालांकि पेट्रोल और डीजल पर लगातार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर और सर्विस टैक्स जैसे इनडायरेक्ट टैक्स से सरकार किसी तरह तय लक्ष्य के मुताबिक कमाई कर पाएगी. काले धन के मोर्चे पर भी सरकार उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. विपक्ष के आरोपों के बीच उद्योग जगत भी दबे मुंह कह रहा है कि योजनाएं जारी करने से ज्यादा उनके अमल पर ध्यान देने की जरूरत है.

वोटों की गुल्लक भरने वाली सियासत!

‘कांइयापन’ के ‘स्विंग’ से अक्सर हम भोले हार जाते हैं! वोटों की गुल्लक को भरने के लिए रथयात्रा निकाले गए. दो भाइयों को हिन्दू और मुसलमान में बांटा गया. तहजीब पर कई जगहों पर दंगों के रूप में तमाचे पड़े. ये देश अंदर और बाहर से आग में धधकने लगा. कई जगहों पर इंसानियत को गहरे जख्म मिले. और फिर शुरू हुई वोटों की फसल काटने का सिलसिला..हर चुनाव में.. या जब आर्थिक नाकामी घेरती है तो राष्ट्रभक्ती जागती है. गाय भक्ती तो बिहार चुनाव में जगी ही थी. उससे पहले यूपी विधानसभा चुनाव में लव जिहाद का लिटमस टेस्ट फेल हुआ था.

‘हम भारत के लोग’ पता नहीं कब जाति, धर्म और ‘हुंकार’ पर समझदार होंगे. हम कब भूख, भय और भ्रष्टाचार पर सही समय पर सही निर्णय लेंगे? हम कब वोट की चोट को व्यवस्था के कोढ़ पर मारेंगे? मुझे समझ नहीं आता कि हम कब सच्चे अर्थों में ‘लोकतंत्र का राजा’ बनेंगे?


देश को ताड़ने का काम कर रही है बीजेपी : मुस्लिम




आल इंडिया तंज़ीम ए इंसाफ के राष्ट्रीय कौंसिल के सदस्य श्री मोहम्मद मुस्लिम ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी देश मे वो कानून लाना चाहती है जो नागपुर मे तयार हुई है,अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिए बीजेपी दूसरे को देश द्रोही कह रही है। 

मुस्लिम ने कहा देश में आपात्कालीन जैसी हालत है।  बीजेपी सरकार देश कि एकता और अखंडता को भांग करना चाहती है यही वजह है कि इस सरकार मैं धार्मिक दंगे बहुत हो रहे हैं। लोगों में खौफ का माहौल है।  एक दिल्ली का एक बीजेपी  विधायक ओ पी शर्मा कन्हैया कुमार को पटयाला हाउस  अदालत  के  परिसर में मरता है और कहता है कि बंदूक होती तोा गोली मार देता और पुलिस दर्शक बन कर देखती रही।  ये हक़ किसने दिया विधायक जी को ?
मुस्लिम सवाल करते हैं बताइये देश द्रोही कौन ?



Tuesday, February 16, 2016

AMU के छात्र भी आए JNU छात्रसंघ के साथ, एएमयु में भी प्रदर्शन ।

अफजल गुरु के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित कराने और भारत विरोधी नारे लगाने के आरोप में जेएनयू छात्रसंघ नेता की गिरफ्तारी के बाद भड़का विवाद अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) तक पहुंच गया है। मंगलवार (16 फरवरी) को अलीगढ़ में एएमयू के छात्रों ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में पुलिस की कथित ज्यादती के विरोध में प्रदर्शन किया। विभिन्न छात्र संगठनों, शिक्षक संघ और कर्मचारी यूनियन के नेताओं ने जेएनयू के छात्रों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी की। उनके हाथ में पोस्टर थे, जिन पर लिखा था, ‘‘राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और रोहित वेमुला के हत्यारों, हमें देशभक्ति ना सिखाओ।’’
प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि भारत के विश्वविद्यालयों में समस्या पैदा करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध संगठनों की भूमिका की जांच हो। एएमयू शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो. मुजाहिद बेग ने कहा कि संकट की इस घड़ी में वे जेएनयू समुदाय के साथ हैं।
एएमयू कर्मचारी संघ के महासयिव शमीम अख्तर ने जेएनयू में प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाये जाने की निन्दा की लेकिन सवाल किया कि क्या पुलिस ने नारेबाजी करने वालों की शिनाख्त की। प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया कि वह आरएसएस से संबद्ध संगठनों के हाथ में खेल रही है।
उधर, मंगलवार को दिल्‍ली यूनिवर्सिटी (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर और संसद पर आतंकी हमले के आरोपी रहे एसएआर गिलानी को भी अरेस्‍ट किया गया। उन पर भी अफजल गुरू के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित करने और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप है। उनके ऊपर भी देशद्रोह का आरोप लगाया गया है। उन्‍हें दो दिन की पुलिस कस्‍टडी पर भेजा गया है।

Sunday, February 14, 2016

मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं, वो हिंदुत्व की राजनीति का शिकार : कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह

पटना। राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार के माता-पिता का कहना है कि उनका बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है, वह हिंदुत्व की राजनीति का शिकार हुआ है। कन्हैया कुमार के पिता जयशंकर सिंह ने शनिवार को कहा, “मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है। उसकी राष्ट्र विरोधी विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं उठता। वह अपनी उम्र के हजारों युवाओं के समान ही राष्ट्रवादी है।”
कन्हैया कुमार की मां मीना देवी ने कहा कि उनका बेटा राष्ट्रवादी है, लेकिन वह आरएसएस-भाजपा की हिंदूवादी राजनीति का समर्थक नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें उसकी विचारधारा पर गर्व है। इसमें कुछ गलत नहीं है। वह दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ लड़ रहा है और इसीलिए उसे निशाना बनाया गया है।” कन्हैया कुमार के माता-पिता बिहार के बेगूसराय जिले के मसलानपुर गांव में रहते हैं। यह जिला वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता है।

सिंह ने कहा कि उनके बेटे को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया है। “वह वामपंथी पार्टी का कार्यकर्ता है और विरोधी पार्टी उसके खिलाफ गंदी राजनीति कर रही है।” कन्हैया की मां ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि उनका बेटा इस हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ लड़ाई जीत जाएगा।

कन्हैया के पैतृक स्थान के अधिकांश ग्रामीणों ने उसकी गिरफ्तारी को लेकर दुख जताया है। गौरतलब है कि कन्हैया कुमार को कथित तौर पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने की बरसी पर जेएनयू के छात्रों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है।

Saturday, February 13, 2016

JNU में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे ABVP ने लगाए, सबुत के तौर पर वीडियो जारी






9 फरवरी की शाम अफज़ल गुरू की याद में हुए प्रोग्राम के बाद प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सुर्खियों में है। देश में राष्ट्रीय समाचार चैनलों का एक गुट जेएनयू और वहां पर सक्रिय वामपंथी संगठनों पर हमलावर है। समाचार चैनलों के कुछ एंकर इस विश्वविद्यालय को खुलेतौर पर देशद्रोहियों का गढ़ कह रहे हैं। जेएनयूएसयू के मौजूदा प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद ऐसे चैनलों को अपने अजेंडा में कामयाबी भी मिल रही है।

हालांकि इसी दौरान सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में ऐसे न्यूज़ चैनलों को एक्सपोज़ करने के अलावा एबीवीपी पर भी सनसनीखेज़ आरोप लगाए गए हैं। वायरल वीडियों में दावा किया गया है कि 9 फरवरी की रात जेएनयू कैंपस में वामपंथी छात्रों को फंसाने के मकसद से एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे।

'द कंस्प्रेसी' नाम से जारी इस वीडियो के मुताबिक 'जेएनयू के बारे में मीडिया जो दिखा रहा है, वह पूरी तरह से बायस्ड, अधूरा और सनसनीखेज है। वीडियो में जब पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे हैं, उस वक्त स्क्रीन पर एबीवीपी के कार्यकर्ता दिख रहे हैं। इसके बाद जब पीछे से पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारों की आवाज़ आ रही है तो वीडियो में दिख रहे एबीवीपी कार्यकर्ता जवाब में ज़िंदाबाद जिंदाबाद बोल रहे हैं।


वीडियो में मीडिया पर सवाल खड़ा करते हुए कहा गया है कि वह पूरा सच नहीं दिखा रहा है। दावा यह भी किया गया है कि यह एबीवीपी की साज़िश है ताकि गैर एबीवीपी छात्रों पर झूठे मुकदमे दर्ज करवाए जा सकें

कन्हैया की गिरफ्तारी ने ABVP, संघ और वर्तमान सरकार के स्पष्ट चेहरे को सामने ला दिया है। यह गिरफ़्तारी JNU के भविष्य और देश के लोकतंत्र के लिये खतरा। AIYFबिहार राज्य परिषद

कन्हैयार कुमार  कि गिरफ्तारी ने ABVP, संघ और वर्तमान सरकार के स्पष्ट चेहरे को सामने ला दिया है। यहJNU U के भविष्य और देश के लोकतंत्र के लिये खतरा। AIYF राज्य परिषद बिहार  इसकी घोर निंदा करती है।
ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन की बिहार राज्य परिषद जके सचिव  संजिव कुमार सिंह दुने जारी बेयान में कहा वाहर विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी एवं पिछले दो दिनों से ABVP एवं वर्तमान भाजपा सरकार की और से जो JNU को बद्नाम करने की शाजिशें रची जा रही है उसका घोर निंदा करती है। 
     जैसा की हमसब और पूरे देश की जनता JNU के इतिहास एवम् उसकी प्रगतिशील परंपरा को जानते है जो की दशकों से संघ परिवार और आज की वर्तमान सरकार के लिए लगातार चुनौती बनी हुयी है। उसी का परिणाम था कि संघ नेता सुब्रमण्यम स्वामी एवम् उसका मुख्य पत्र पञ्चजन्य ने आज से पांच महिने पहले हीं JNU को आतंकबाद का गढ़ कहा था और देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र कहा था। और आज जब देश रोहित को न्याय की मांग कर रही है तो ABVP के हुड़दंग एवम् कुछ अज्ञात, नकबपोस चेहरे के नारे का बहाना बना JNU को पूनः बदनाम करने, वहां के लोकतांत्रिक माहोल को खत्म करने और छात्र आंदोलन को दमित करने का प्रयास कर रही है।
         AIYF कन्हैया की गिरफ़्तारी और इस पूरे घटना क्रम में ABVP, संघ, पूर्वी दिल्ली के भाजपा संसद महेश गिरी और आज के गृहमंत्री की करवायी जाहिर करती है कि JNU को बड़ी साजिश का हिस्सा बना वहां के लोकतांत्रिक माँहोल एवम् आंदोलनों को खत्म करने का प्रयाश है जिसे देश के विद्यार्थियों एवम् जनता को पूरी तरह वेनकाब करते हुए JNU एवम् देश के लोकतंत्र के रक्छा की अपील करते हैं।
     इसके साथ उन अज्ञात नकबपोस लोगों के नारों की निंदा करते हुए सरकार से उनकी पहचान कर फॉरन गिरफ़्तारी की मांग करते हैं। हमें ताज्जुब है कि जो लोग वर्षों से खुले में नारे लगते हुए देश एवम् देश की जनता के सवालों को उठाते रहे, और जो उस संगठन से जुड़ा है जो देश को आजाद करने के लिए असंख्य कुर्बानियां दी उस संगठन के नेता को देशद्रोही के आरोप मेँ गिरफ्तार किया गया है और हुड़दंग करने बाले, हमला करने बाले और नकबपोस खुले घूम रहे हैं।


JNU अध्यक्ष की गिरफ्तारी, लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला , जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सम्मानित करेगा रिहाई मंच

एसएफआई दफ्तर पर हमला करने वाले एबीवीपी के गुण्डों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए


लखनऊ 12 फरवरी 2016। रिहाई मंच ने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को  देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की कड़ी निंदा की है और इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हुए जेएनयू अध्यक्ष को सम्मानित करने का ऐलान किया है। मंच ने लखनऊ स्थित स्टूडेन्ट फेडरेशन आॅफ इंडिया (एसएफआई) के दफ्तर पर एबीवीपी के गुण्डों द्वारा हमले को संघ परिवार की दहशतगर्दी का एक और उदाहरण बताया है। 


रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि अफजल गुरू की फांसी जिसपर पूरी दुनिया में देश की न्यायपालिका की बदनामी हो चुकी है, पर अगर किसी विश्वविद्यालय में छात्र बहस करते हैं तो इसे उनके लोकतांत्रिक अधिकार के तहत जोड़कर देखा जाना चाहिए। दिल्ली में झंडेवालान में जिस तरह से महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस के साथ मिलकर संघी गुण्डों ने मारा-पीटा जिसके वीडियो होने के बावजूद आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई वो साबित करता है कि राज्य की पूरी मशीनरी संघ के एजेण्डे पर काम कर रही है। जिस संघ परिवार का आजादी की लड़ाई में अग्रेजों के साथ मिली भगत का इतिहास रहा है, जिसका सिद्धांतकार माना जाने वाला सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से रिहा हुआ हो, कांग्रेस में रहने के दौरान जेल जाने पर जब सभी कांग्रेसी हफ्तों आमरण अनशन पर बैठे हों जिसके कारण उनक वजन कम हो चुका हो तब हेडगेवार का जेलर से मिली भगत करके खाना खाना और अपना वजन 8 किलो बढा़ लिया हो और जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेई ने 1942 में पुलिस की मुखबिरी करके क्रांतिकारी नेता लीलाधर वाजपेई को जेल भेजवा दिया हो उनसे बड़ा देशद्रोही आतंकी संगठन कोई नहीं है। इसलिए अफजल गुरू की फांसी पर बहस करने वाले छात्रों के बजाए संघियों को देश द्रोह के आरोप में जेल में ठूसा जाना चाहिए। 


रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि जिस संघ परिवार के लोगों का नाम देश भर में हुए आतंकी घटनाओं में नामजद है, जिसके नेता मोदी की तस्वीर असीमानंद जैसे दुर्दांत आतंकी के साथ सार्वजनिक हो चुकी हो, जिसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृहमंत्री राजनाथ सिंह की महिला आतंकी साध्वी प्रज्ञा के साथ गोपनीय बैठक की तस्वीर हो, जिसके लोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे की पूजा करते हों उस संगठन का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। इस देशद्रोही विचारधारा का विरोध करने वाला हर व्यक्ति देश भक्त है। जेएनयू अध्यक्ष ने फासिस्ट निजाम के खिलाफ जो संघर्ष किया है उसके लिए रिहाई मंच कन्हैया कुमार का नागरिक अभिनंदन कर सम्मानित करेगा।


रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने लखनऊ विधानसभा स्थित एसएफआई कार्यालय पर एबीवीपी द्वारा किए गए हमले को पूरे देश पर हो रहे भगवा हमले का ताजा उदाहरण बताया है। जिस तरह एबीवीपी के गुण्डों ने एसएफआई दफ्तर में लगी शहीद ए आजम भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल की तस्वीरें तोड़ीं वह साबित करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अंगे्रजों की दलाली करने वाले संघी उस आंदोलन के नायकों से कितना नफरत करते हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे अग्रेजों से माफी मांगने वाले संघी सावरकर की असली औलाद हैं। भारतीय संस्कृित और महिलाओं की बड़ी-बड़ी बात करने वाले लोगों ने महिला नेता सीमा राना के साथ मारपीट करके अपने महिला विरोधी चरित्र को फिर उजागर किया है। घटना के बाद एसएफआई के कार्यकताओं से मुलाकात करके लौटे रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने कहा कि ठीक विधानसभा के सामने स्थित एसएफआई कार्यालय पर संघी गुण्डों द्वारा किया गया हमला बताता है कि सपा सरकार इन दहशतगर्दों को संरक्षण दे रही है। मंच ने मांग की कि दोषियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए। उन्होंने मांग की है कि विधानसभा के ठीक सामने स्थित भाजपा कार्यालय को तत्काल वहां से हटाकर विधानसभा की सुरक्षा को पुख्ता किया जाए। उन्होंने मांग की कि प्रदेश में संघ व भाजपा कार्यालयों पर सरकार सीसीटीवी कैमरा लगवाकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखे। क्योंकि इन्हीें दफ्तरों से पूरे सूबे में सांप्रदायिक दहशतगर्दी और दंगों की रणनीति रची जाती है।  







Friday, February 12, 2016

JNU मामला : एक ही चैनल वहां कैसे तैनात था


ओम थानवी 
आज जेएनयू में कई छात्रों और शिक्षकों से बात हुई। दो छात्र वहां मौजूद थे, जहाँ हल्ला हुआ। दोनों ने कहा कि कश्मीर के नारे वहां लगे, पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नहीं। वीडियो का भरोसा कई लोग न करते मिले, एक ही चैनल वहां कैसे तैनात था यह पहलू भी वीडियो एडिटिंग पर शक पैदा करता है। टीवी चैनल छात्रों के ऐसे आयोजनों को कब कवर करते हैं।
बहरहाल, कोई शिक्षक या छात्र ऐसा नहीं मिला जो पाकिस्तान के नारे लगाने को उचित समझता हो - चाहे वे लगे हों या न लगे हों।
जहाँ तक मेरी अपनी राय है (जिसे बिना जाने ही कुछ अतिउत्साही तो अपने स्वयंभू निष्कर्ष पर भी जा पहुंचे!), तो मेरा स्पष्ट मानना है कि नागरिकों की आजादी का दायरा बहुत व्यापक है। इस तरह छात्रों का भी। अगर वे कश्मीर की आजादी के नारे लगाते हैं, या अफ़ज़ल की फाँसी का विरोध करते हैं तो जहाँ तक उनके अधिकार का सवाल है इस अभिव्यक्ति में कुछ गलत नहीं। हालाँकि मैं कश्मीर की आजादी मांग को उचित नहीं मानता, पर फांसी के विरोध को सही मानता हूँ। ठीक इसी तरह आप या कोई भी उनसे असहमत हो सकता है, यहाँ तक कि कुछ समय बाद उनमें से कोई खुद अपने आप को अलग राय का पा सकता है। जैसा कि कल मैंने लिखा भी कि छात्र जीवन में विचार बनते-बिगड़ते ही आकार लेते हैं।
पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों की पुष्टि भले नहीं हुई, फिर भी अपनी राय साफ रख दूँ - भारत में कोई ऐसे नारे नहीं लगा सकता, लगाए तो सर्वथा अनुचित होगा।
लेकिन एक बदनाम टीवी चैनल के संदिग्ध वीडियो के आधार पर कोई छात्र जमात को ही नहीं, देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय पर ताला जड़ने की बात कहे तो यह दुराग्रह की हद होगी। लोग जानते हैं कि प्रगतिशील विचारों के कारण जेएनयू बरसों से संघ परिवार की आँख की किरकिरी बना हुआ है। अब अपने लोग कोतवाल बने हैं तो हिसाब चुकता करने की बेचैनी मानो बढ़ चली है। अफसोस यही है कि राष्ट्रपिता गांधी के हत्यारे गोडसे का मंदिर बनने पर तो इनका राष्ट्रप्रेम दुबक जाता है, पर छात्रों के एक आयोजन का हल्लाछाप वीडियो देखकर वीरबालक की मुद्रा में विलाप की मानिंद जाग जाता है।


*ओम थानवी के फेस बुक वाल से