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Monday, March 7, 2016

JNU का साच : षडय़ंत्र की परतें










राजेंद्र शर्मा

जेएनयू में छात्रों के एक ग्रुप के 9 फरवरी के जिस आयोजन के नाम पर, मोदी सरकार और संघ परिवार ने अपने सभी विरोधियों और सबसे बढ़कर वामपंथ को देशद्रोही दिखाने की जबर्दस्त मुहिम छेड़ी है, उस आयोजन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। बेशक, इस क्रम में अफजल गुरु की फांसी की सजा के विरोध को जिस तरह देशद्रोह बनाने की कोशिश की गई है, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार के नारे लगाने भर को राजद्रोह नहीं माना जा सकता है। वास्तव में इस संबंध में तो देश का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्टï राय दे चुका है और बाकायदा हिंसा के लिए फौरी उकसावे की शर्त लगा चुका है। फिर भी, उक्त आयोजन को लेकर सरकार समेत संघ परिवार की ''देशद्रोह के नमूनेÓÓ की निर्मिति खुद गंभीर संदेहों के घेरे में है। इन संदेहों के दो-तीन तत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला, तथ्य जो खासतौर पर दिल्ली सरकार द्वारा कराई गई पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच से सामने आया है, यह है कि उक्त आयोजन के लिए दो टेलीविजन चैनलों के कैमरों को विशेष रूप से और निजी तौर पर बुलाया गया था। इनमें से एक चैनल को तो बाद में उक्त कार्यक्रम की रिकार्डिंग के साथ छेड़छाड़ कर के कन्हैया के मुंह से नारे लगवाने वाला फर्जी वीडियो बनाने के लिए, रंगे हाथों पकड़ा भी गया है। यह दूसरी बात है कि भाजपा सरकार के आशीर्वाद से इसके बावजूद, इस चैनल को कोई नोटिस तक नहीं मिला है, फिर दूसरों को वीडियो के साथ फर्जीवाड़ा न करने का सबक देने वाली कोई सजा दिए जाने का तो सवाल ही कहां उठता है। विश्वविद्यालय सिक्युरिटी के परिसर में प्रवेश के रिकार्ड के अनुसार, इन चैनलों को प्रस्तावित आयोजन से काफी पहले और जेएनयू के एबीवीपी नेताओं द्वारा बुलाया गया था।
इससे कम से कम एक बात तो निर्विवाद रूप से साबित हो ही जाती है। 9 फरवरी को जेएनयू में जो कुछ हुआ, स्वत:स्फूर्त नहीं था। उसके लिए कम से कम उन लोगों की तरफ से पूरी तैयारी थी, जिन्होंने बाद में इसे जेएनयू के खिलाफ हमले का हथियार बनाया। क्या टेलीविजन चैनल इस पूर्व-नियोजित टकराव को, संघ-एबीवीपी के पक्ष से दर्ज करने के लिए ही बुलाए गए थे? आखिरकार, 'देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों के युद्घÓ के भोंडे रूपक के प्रचार के जरिए,  इस रिकार्डिंग का जेएनयू के छात्र आंदोलन को बदनाम करने में तो उपयोग किया ही जा सकता था। पहले पुणे फिल्म तथा टेलीविजन इंस्टीट्यूट, फिर मद्रास आईआईटी पेरियार-आंबेडकर स्टडी सर्किल, फिर गैर-नैट छात्रवृत्ति बंद किए जाने के खिलाफ आक्यूपाई यूजीसी और अंतत: रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, हरेक मामले में मोदी सरकार और उसकी शिक्षा मंत्री के कदमों के खिलाफ संघर्ष के अगले मोर्चे पर रहे जेएनयू के वामपंथी छात्र आंदोलन पर अंकुश लगाना जरूरी था।
लेकिन, लगता है कि खेल शायद इससे भी बड़ा था। एबीवीपी के बुलाए वफादार चैनलों की रिकार्डिंग के माध्यम से सत्तापक्ष तथा उसके द्वारा नियंत्रित शासन-प्रशासन के पास, 9 फरवरी को जो कुछ हुआ था, उसकी साक्ष्यों समेत पूरी जानकारी शुरु से ही थी, जिसमें आपत्तिजनक नारे लगाने वालों से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। इसके बावजूद, पहले एबीवीपी व भाजपा सांसद की शिकायत के माध्यम से सिर्फ आपत्तिजनक नारों को उछाला गया और उनके लिए छात्रसंघ के अध्यक्ष व महासचिव समेत, वामपंथी छात्र नेताओं के मुंह में ये नारे रखने की कोशिश की गई। इनका झूठ अब बाकायदा पकड़ा जा चुका है।  लेकिन, कन्हैया की गिरफ्तारी से लेकर अब जमानत पर रिहाई तक, पिछले इतने घटनापूर्ण करीब चार हफ्तों में पुलिस, न सिर्फ उक्त नकाबपोशों को पकड़ नहीं पाई है बल्कि उनकी किसी तरह से पहचान तक नहीं कर पाई है। वास्तव में पुलिस इस सच्चाई को देखकर भी नहीं देखना चाहती है कि कोई बाहरी नकाबपोश थे, जिन्होंने उक्त आपत्तिजनक नारे लगाए थे।
इसका सबसे उदार अर्थ तो यही हो सकता है कि सरकार की और इसलिए उसकी पुलिस की भी दिलचस्पी, वास्तव में न तो उक्त राष्टï्रविरोधी नारों में थी और न उक्त नारे लगाने वालों को देश के कानून के तहत बनने वाली सजा दिलाने में। उनकी दिलचस्पी तो जेएनयू छात्र आंदोलन, जेएनयू और उसके बहाने से विपक्ष तथा विशेष रूप से वामपंथ को देशविरोधी प्रचारित करने में थी और यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। लेकिन, इससे एक और गंभीर आशंका भी पैदा होती है। कहीं मौके पर संघ के वफादार टेलीविजन कैमरों की ही तरह, देश तोडऩे के नारे लगाने वाले नकाबपोशों की उपस्थिति भी प्रायोजित और इसलिए एक बड़े षडय़ंत्र का हिस्सा तो नहीं थी? बेशक, नवउदारवाद के इस जमाने में बार-बार कहकर 'षडय़ंत्र सिद्घांतÓ को इतना बदनाम कर दिया गया है कि ऐसे षडय़ंत्र की ओर इशारा करते हुए भी हिचक होती है। लेकिन, सच्चाई यह है कि दुनिया भर में सत्ताधारी ताकतेें, एजेंट प्रोवेकेटियरों का ऐसा उपयोग करती आई हैं और आज भी कर रही हैं।
वास्तव में इसी बीच सामने आई इशरत जहां प्रकरण को नया रंग देने की सारी कोशिशों के बावजूद, पूर्व-गृह सचिव जीके पिल्लै ने चिदंबरम तथा कांग्रेस को मुश्किल में डालने की कोशिश करते हुए भी, इस पूरे प्रकरण के खुफिया ब्यूरो का एक ''कंट्रोल्ड आपरेशनÓÓ होने की बात मानी है। सुरक्षातंत्र की भाषा के जानकारों के अनुसार, इस मामले में कंट्रोल्ड ऑपरेशन का संक्षिप्त अर्थ है—बहकाकर बुलाना और खत्म कर देना! हालांकि यह सोचकर दहशत होती है, फिर भी सच यही है कि जो खुफिया एजेंसियां एक कॉलेज छात्रा समेत चार लोगों को, उनकी पृष्ठïभूमि कुछ भी हो, फंसाकर षडय़ंत्रपूर्वक मौत के घाट उतार सकती हैं और इससे सत्ताधारी नेताओं की हत्या के षडय़ंत्र को विफल करना प्रचारित कर सकती हैं, क्या एक कार्यक्रम में अपने 'मनचाहेÓ नारे लगवाने के लिए तीन नकाबपोश खड़े नहीं कर सकती हैं? क्या पुलिस इसीलिए उन्हें बचा रही है? मुद्दा नारों के देशद्रोहात्मक या राजद्रोहात्मक होने न होने का नहीं है। मुद्दा इस मुद्दे को इतना तूल देने के बावजूद, ये नारे लगाने वालों की सही पहचान करने से शासनतंत्र के कतराने का है। जब तक उक्त नकाबपोशों की पक्की पहचान नहीं की जाती है और इसी के हिस्से के तौर पर छात्रसंघ के पदाधिकारियों समेत वामपंथी छात्र नेताओं को उक्त नारों से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह संदेह बना ही रहेगा और समय गुजरने के साथ और गहरा होता जाएगा कि कहीं यह भी छात्र आंंदोलन तथा आम तौर पर विपक्ष के खिलाफ खुफिया ब्यूरो-संघ परिवार का मिला-जुला ''कंट्रोल्ड ऑपरेशनÓÓ तो नहीं था! यह ऑपरेशन उनके लिए अंतत: फायदे का सौदा होगा या घाटे का, यह एक अलग विषय है

देशबंधु

Saturday, March 5, 2016

कन्हैया तो एक झाँकी है .......




सतीश मिश्रा

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘अंकुर’। श्याम बेनेगल की इस फिल्म का आखिरी 5 सेकंड का दृश्य ही पूरी फिल्म की जान था। इसमें पूरा गांव जमींदार के दमन और शोषण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पाता, मानों हर जुल्म सहना उनकी नियति बन गई हो लेकिन आखिरी सीन में भुक्तभोगी दंपती (अनंत नाग व शबाना आजमी) का नन्हा सा बेटा संदेश देता है कि भले ही उसके मां-पिता  ने सloबकुछ सह लिया हो लेकिन अब नई पीढ़ी यह बर्दाश्त नहीं करेगी और पहला पत्थर उस जमींदार के अभेद्य दुर्ग पर फेंककर उसकी खिड़की का कांच तोड़ देता है जिसकी ओर देखने की किसी में हिम्मत नहीं थी। इस ऐक्ट में इतना कुछ छिपा था जो शायद वह ढाई घंटे की फिल्म नहीं बोल पाई।
दूसरी आजादी का नारा देनेवाले जयप्रकाश नारायण रहे हों या संपूर्ण क्रांति के पक्षधर राममनोहर लोहिया या फिर सबसे ताजातरीन आंदोलक अन्ना हजारे, हर क्रान्ति का पेट्रोल युवाओं की धमनियों से ही आया है। मेक इन इंडिया के तहत सरकार ने स्टार्ट-अप योजना पेश की थी लेकिन कन्हैया ने तो उसे कुछ अलग ही तरीके से अपनाकर सर जी, का पूरा आइडिया ही खराब कर दिया। एक ही झटके से विडियो-ऑडियो में कट-पेस्ट करनेवालों को पेचिश लग गई। 65% आबादी 35 वर्ष का फॉर्म्युला गिना-गिनाकर सत्ता पाने के बाद क्या उस 35 साल वालों को उसी अनुपात में सत्ता का अधिकार दिया गया? आज जरूरत है कि युवाओं की इस उपस्थिति का एहसास उन्हें फैसला लेने की शक्ति देकर किया जाए।
यह शाश्वत सत्य है कि षड़यंत्रों से युवकों की आवाज कभी दबाई नहीं जा सकती या किसी वर्ग की आवाज दबाकर, उनका माखौल उड़ाकर, तिरस्कार कर और बोलने की आज़ादी की जब कोशिश होगी तब वे उतने ही मुखर बनेंगे। देश इवेंट मैनेजमेंट के सहारे नहीं चलता। वह चलता है भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, समानता और महंगाई को मैनेज करने से। इन मोर्चों पर असफल रहने पर ऐसे ही अरविंदों, राहुलों और कन्हैयों की भरमार होती रहेगी।
कुमार विश्वास की कन्हैया पर बिल्कुल सटीक प्रतिक्रिया थी कि यह छोटा रिचार्ज तो पूरे नेटवर्क को उड़ा देने की क्षमता रखता है। कन्हैया ने सही याद दिलाया कि सीमा पर मारे जानेवाले सैनिक का कभी कोई भाई-भतीजा या रिश्तेदार क्यों राजनीतिज्ञ, मंत्री या बड़े अफसर नहीं निकलता? हर बार उन सैनिकों की शहादत पर उनका ताबूत गांवों-कस्बों में किसान या मध्यवर्ग ही क्यों पहुंचता है? उनकी शहादत पर घड़ियाली आंसू बहानेवाले क्या जाने उस दर्द को?
अभी कुछ महीनों पहले तक तो भक्त यही मान रहे थे कि कांग्रेस की हताशाभरी हार के बाद नेतृत्व पर अगर कोई उंगली उठा सकता है तो वह केवल अरविंद केजरीवाल हैं। लेकिन तब तक शानदार विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ नीतीश कुमार आ धमके। अभी यह जोड़ी बनी थी कि राहुल के नए तेवरों ने ध्यान खींचा और तब तक रोहित वेमुला प्रकरण से दुखी पूरे युवा वर्ग से पंगा ले लिया गया कन्हैया को गिरफ्तार करके। यह एक की गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि उसी 35 की आयुवाले 65% वर्ग से ले ली गई नाराजगी थी।
तमिलनाडु में लिट्टे से सहानुभूति रखनेवाली जयललिता, पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को पनपने दे रहे अकाली दल, कश्मीर में PDP, असम में बोडोलैंड सहित देश में जितने अलगाववादी संगठन है उन सब से सत्ता की खातिर हाथ मिलाना ही क्या राष्ट्रप्रेम है? हीनभावना किसमें है यह देश को बताने की जरूरत है?
राहुल के नेतृत्व क्षमता पर उठे प्रश्न के बदले वास्तव में तो उनकी दाद तो देनी चाहिए कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए विरोध व्यक्त करने के लिए प्रधानमंत्री के अध्यादेश को फाड़ने की हिम्मत की। आज मार्गदर्शक मंडल चिठ्ठी लिखने के अलावा कुछ कर सकता है? कन्हैया की बात में दम है कि लोगों को हीनभावना पर चर्चा महत्वपूर्ण लगती है लेकिन काला धन वापसी, JNU कांड, रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या, हरियाणा के हिंसक जाट आंदोलन, पठानकोट हमला, EPF में टैक्स की बात मन में क्यों नहीं आती?
चलते-चलाते
राष्ट्रप्रेमी चिल्लाने से कोई राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकता। कन्हैया में देशद्रोही तलाशनेवालों सचमुच में राष्ट्रविरोधी पौधा देखना है तो कोई कश्मीर जाकर देखे जहां रोज सैकड़ों युवक मिलेंगे जो खुलेआम भारत के टुकड़े करने का आह्वान करते हैं और तिरंगे को रौंदते/जलाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना है कि यह सब उसी कश्मीर में हो रहा है जहां बीजेपी की सरकार है


#नवभारत टाइम्स

Tuesday, February 23, 2016

JNU विवाद पर नया खुलासा, नहीं लगे 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे


नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में नारेबाजी के मामले में दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में नया खुलासा हुआ हैै। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेएनयू र्यक्रम के दौरान कुल 29 नारे लगाए गए, लेकिन 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा नहीं लगा था।
सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने जेएनयू में हुए मामले में कुल 12 पेज की एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में 29 नारों का चर्चा है, लेकिन ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे का जिक्र नहीं है।
वहीं, देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद और उसके चार साथियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत की अर्जी दी है। बताया जा रहा है कि वे प्रोटेक्शन में सरेंडर की रिक्वेस्ट करेंगे।
यहां पर याद दिला दें कि जेएनयू कैंपस में 9 फरवरी की रात को संसद पर हमले के दोषी आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई और इस मौके पर देश विरोधी नारे भी लगाए गए। आरोप है कि यहां पर कुछ छात्रों ने पाकिस्तान जिंदाबाद जैसे देशद्रोही नारे लगाए थे।
अब इस मामले में डिप्टी कमिशनर ऑफ पुलिस (साउथ) प्रेमनाथ ने अपनी जांच रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अफजल की बरसी के दौरान कार्यक्रम में कई तरह के नारे गूंजे थे, लेकिन पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा नहीं गूजा था।
जांच रिपोर्ट में प्रत्यक्षदर्शी भी शामिल हैं, जिनमें विश्वविद्यालय के छात्र और स्टाफ शामिल हैं। गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने 12 फरवरी को एक निजी टेलीविजन चैनल की फुटेज के आधार पर एक मामला दर्ज किया था। हैरानी की बात यह है कि इस वीडियो में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी थे

दैनिक जागरण

Wednesday, February 17, 2016

Inside Story :भाजपा की स्टूडेंट इकाई एबीवीपी में दो फाड़,कन्हैया तिहाड़ जेल के कमरा नंबर तीन में बंद

जेएनयू मामले में एक नया मोड़ आ गया है जिससे भाजपा की मुश्‍किलें बढ़ सकतीं हैं। जेएनयू विवाद को लेकर चल रहे घमासान के बीच भाजपा की स्टूडेंट इकाई एबीवीपी में दो फाड़ हो गया है। खबर है कि एबीवीपी के जेएनयू यूनिट के जॉइंट सेक्रेटरी प्रदीप नरवाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है यहीं नहीं इसके अलावा एसएसएस के एबीवीपी यूनिट के प्रेजीडेंट राहुल यादव और एसएसएस के एबीवीपी यूनिट के सेक्रेटरी अंकित हंस ने भी अपने अपने पद छोड़ दिए हैं। इस बात की जानकारी प्रदीप ने अपनी फेसबुक वॉल के माध्‍यम से दी है।
आपको बता दें कि 9 फरवरी को जेएनयू परिसर में भारत के विरोधी लगे नारों पर लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रिया आई जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों को दो भागों में बंटते देखा गया। एबीवीपी के जेएनयू यूनिट के जॉइंट सेक्रेटरी प्रदीप नरवाल के मुताबिक केंद्र सरकार ने मामले को जिस तरीके से हस्तक्षेप किया है वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया।
इधर, पटियाला हाउस कोर्ट ने सुनवाई के बाद जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को बुधवार को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अब वह दो मार्च तक जेल में रहेंगे। कन्हैया को तिहाड़ की जेल नंबर तीन में कड़ी सुरक्षा में रखा गया है। कन्हैया पर हमले के बाद शीर्ष अदालत को भी इस मामले में दखल देना पड़ा। पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए दिल्ली पुलिस की आयुक्त बीएस बस्सी को तलब किया। निचली अदालत में मचे हंगामे के बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से भेजे गये पांच वकीलों की टीम पर पत्थर फेंके गये। उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए पटियाला हाउस कोर्ट के वकीलों के एक धड़े ने नारेबाजी की। इससे पहले कन्हैया ने पटियाला कोर्ट को दिये बयान में कहा कि कोर्ट परिसर में भीड़ ने उसके साथ मारपीट की।
वहीं, पटियाला हाउस कोर्ट में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान बुधवार दोपहर फिर अराजकता दिखी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार की सुबह 10:30 बजे तक दिल्ली पुलिस से पूरे मामले पर रिपोर्ट देने को कहा है। 18 से भाजपा का ‘जन स्वाभिमान अभियान': देश विरोधी आवाजों को अभिव्यक्ति की आजादी के तौर पर पेश करने और गुमराह करने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए भाजपा गुरुवार से तीन दिवसीय अभियान चलायेगी। 18 से 20 फरवरी तक ‘जन स्वाभिमान अभियान' चलाया जायेगा। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ता धरना देंगे।
तिहाड़ जेल के कमरा नंबर तीन में बंद
कन्हैया ने रिमांड सुनवाई के लिए पेश किये जाने पर मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट से कहा कि मैंने पहले भी कहा है। मैं भारतीय हूं। मुझे देश के संविधान और न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। मेरे विरुद्ध मीडिया ट्रायल पीड़ादायक है। यदि मेरे विरुद्ध सबूत है कि मैं गद्दार हूं, तो कृपया मुझे जेल भेज दीजिए। यदि मेरे खिलाफ सबूत नहीं हैं, तो मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। उसके इस बयान पर पुलिस ने कहा कि वह उसकी जमानत का विरोध नहीं करेगी।
पत्थर फेंके गये गालियां दी गयीं
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद दिल्ली पुलिस पटियाला हाउस कोर्ट में सुरक्षा व्यवस्था कायम करने में नाकाम रही। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से भेजे गये पांच वकील पटियाला हाउस पहुंचे। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट को पटियाला हाउस में हुई घटना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान उस पर हमला हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान रूम खाली करने का आदेश दिया। बाद में सुनवाई रोक दी। फिर वकीलों की टीम ने शीर्ष अदालत को बताया कि मी लार्ड कोर्ट परिसर में हमारे ऊपर बोतल और पत्थर फेंके गये और गालियां भी दी गयीं। इस टीम में कपिल सिब्बल, राजीव धवन, दुष्यंत दवे, एडीएन राव, अजित सिन्हा और हरिन रावल शामिल थे।

Sunday, February 14, 2016

मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं, वो हिंदुत्व की राजनीति का शिकार : कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह

पटना। राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार के माता-पिता का कहना है कि उनका बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है, वह हिंदुत्व की राजनीति का शिकार हुआ है। कन्हैया कुमार के पिता जयशंकर सिंह ने शनिवार को कहा, “मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है। उसकी राष्ट्र विरोधी विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं उठता। वह अपनी उम्र के हजारों युवाओं के समान ही राष्ट्रवादी है।”
कन्हैया कुमार की मां मीना देवी ने कहा कि उनका बेटा राष्ट्रवादी है, लेकिन वह आरएसएस-भाजपा की हिंदूवादी राजनीति का समर्थक नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें उसकी विचारधारा पर गर्व है। इसमें कुछ गलत नहीं है। वह दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ लड़ रहा है और इसीलिए उसे निशाना बनाया गया है।” कन्हैया कुमार के माता-पिता बिहार के बेगूसराय जिले के मसलानपुर गांव में रहते हैं। यह जिला वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता है।

सिंह ने कहा कि उनके बेटे को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया है। “वह वामपंथी पार्टी का कार्यकर्ता है और विरोधी पार्टी उसके खिलाफ गंदी राजनीति कर रही है।” कन्हैया की मां ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि उनका बेटा इस हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ लड़ाई जीत जाएगा।

कन्हैया के पैतृक स्थान के अधिकांश ग्रामीणों ने उसकी गिरफ्तारी को लेकर दुख जताया है। गौरतलब है कि कन्हैया कुमार को कथित तौर पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने की बरसी पर जेएनयू के छात्रों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है।