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Saturday, March 5, 2016

कन्हैया तो एक झाँकी है .......




सतीश मिश्रा

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘अंकुर’। श्याम बेनेगल की इस फिल्म का आखिरी 5 सेकंड का दृश्य ही पूरी फिल्म की जान था। इसमें पूरा गांव जमींदार के दमन और शोषण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पाता, मानों हर जुल्म सहना उनकी नियति बन गई हो लेकिन आखिरी सीन में भुक्तभोगी दंपती (अनंत नाग व शबाना आजमी) का नन्हा सा बेटा संदेश देता है कि भले ही उसके मां-पिता  ने सloबकुछ सह लिया हो लेकिन अब नई पीढ़ी यह बर्दाश्त नहीं करेगी और पहला पत्थर उस जमींदार के अभेद्य दुर्ग पर फेंककर उसकी खिड़की का कांच तोड़ देता है जिसकी ओर देखने की किसी में हिम्मत नहीं थी। इस ऐक्ट में इतना कुछ छिपा था जो शायद वह ढाई घंटे की फिल्म नहीं बोल पाई।
दूसरी आजादी का नारा देनेवाले जयप्रकाश नारायण रहे हों या संपूर्ण क्रांति के पक्षधर राममनोहर लोहिया या फिर सबसे ताजातरीन आंदोलक अन्ना हजारे, हर क्रान्ति का पेट्रोल युवाओं की धमनियों से ही आया है। मेक इन इंडिया के तहत सरकार ने स्टार्ट-अप योजना पेश की थी लेकिन कन्हैया ने तो उसे कुछ अलग ही तरीके से अपनाकर सर जी, का पूरा आइडिया ही खराब कर दिया। एक ही झटके से विडियो-ऑडियो में कट-पेस्ट करनेवालों को पेचिश लग गई। 65% आबादी 35 वर्ष का फॉर्म्युला गिना-गिनाकर सत्ता पाने के बाद क्या उस 35 साल वालों को उसी अनुपात में सत्ता का अधिकार दिया गया? आज जरूरत है कि युवाओं की इस उपस्थिति का एहसास उन्हें फैसला लेने की शक्ति देकर किया जाए।
यह शाश्वत सत्य है कि षड़यंत्रों से युवकों की आवाज कभी दबाई नहीं जा सकती या किसी वर्ग की आवाज दबाकर, उनका माखौल उड़ाकर, तिरस्कार कर और बोलने की आज़ादी की जब कोशिश होगी तब वे उतने ही मुखर बनेंगे। देश इवेंट मैनेजमेंट के सहारे नहीं चलता। वह चलता है भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, समानता और महंगाई को मैनेज करने से। इन मोर्चों पर असफल रहने पर ऐसे ही अरविंदों, राहुलों और कन्हैयों की भरमार होती रहेगी।
कुमार विश्वास की कन्हैया पर बिल्कुल सटीक प्रतिक्रिया थी कि यह छोटा रिचार्ज तो पूरे नेटवर्क को उड़ा देने की क्षमता रखता है। कन्हैया ने सही याद दिलाया कि सीमा पर मारे जानेवाले सैनिक का कभी कोई भाई-भतीजा या रिश्तेदार क्यों राजनीतिज्ञ, मंत्री या बड़े अफसर नहीं निकलता? हर बार उन सैनिकों की शहादत पर उनका ताबूत गांवों-कस्बों में किसान या मध्यवर्ग ही क्यों पहुंचता है? उनकी शहादत पर घड़ियाली आंसू बहानेवाले क्या जाने उस दर्द को?
अभी कुछ महीनों पहले तक तो भक्त यही मान रहे थे कि कांग्रेस की हताशाभरी हार के बाद नेतृत्व पर अगर कोई उंगली उठा सकता है तो वह केवल अरविंद केजरीवाल हैं। लेकिन तब तक शानदार विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ नीतीश कुमार आ धमके। अभी यह जोड़ी बनी थी कि राहुल के नए तेवरों ने ध्यान खींचा और तब तक रोहित वेमुला प्रकरण से दुखी पूरे युवा वर्ग से पंगा ले लिया गया कन्हैया को गिरफ्तार करके। यह एक की गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि उसी 35 की आयुवाले 65% वर्ग से ले ली गई नाराजगी थी।
तमिलनाडु में लिट्टे से सहानुभूति रखनेवाली जयललिता, पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को पनपने दे रहे अकाली दल, कश्मीर में PDP, असम में बोडोलैंड सहित देश में जितने अलगाववादी संगठन है उन सब से सत्ता की खातिर हाथ मिलाना ही क्या राष्ट्रप्रेम है? हीनभावना किसमें है यह देश को बताने की जरूरत है?
राहुल के नेतृत्व क्षमता पर उठे प्रश्न के बदले वास्तव में तो उनकी दाद तो देनी चाहिए कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए विरोध व्यक्त करने के लिए प्रधानमंत्री के अध्यादेश को फाड़ने की हिम्मत की। आज मार्गदर्शक मंडल चिठ्ठी लिखने के अलावा कुछ कर सकता है? कन्हैया की बात में दम है कि लोगों को हीनभावना पर चर्चा महत्वपूर्ण लगती है लेकिन काला धन वापसी, JNU कांड, रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या, हरियाणा के हिंसक जाट आंदोलन, पठानकोट हमला, EPF में टैक्स की बात मन में क्यों नहीं आती?
चलते-चलाते
राष्ट्रप्रेमी चिल्लाने से कोई राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकता। कन्हैया में देशद्रोही तलाशनेवालों सचमुच में राष्ट्रविरोधी पौधा देखना है तो कोई कश्मीर जाकर देखे जहां रोज सैकड़ों युवक मिलेंगे जो खुलेआम भारत के टुकड़े करने का आह्वान करते हैं और तिरंगे को रौंदते/जलाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना है कि यह सब उसी कश्मीर में हो रहा है जहां बीजेपी की सरकार है


#नवभारत टाइम्स