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Saturday, March 5, 2016

कन्हैया तो एक झाँकी है .......




सतीश मिश्रा

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘अंकुर’। श्याम बेनेगल की इस फिल्म का आखिरी 5 सेकंड का दृश्य ही पूरी फिल्म की जान था। इसमें पूरा गांव जमींदार के दमन और शोषण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पाता, मानों हर जुल्म सहना उनकी नियति बन गई हो लेकिन आखिरी सीन में भुक्तभोगी दंपती (अनंत नाग व शबाना आजमी) का नन्हा सा बेटा संदेश देता है कि भले ही उसके मां-पिता  ने सloबकुछ सह लिया हो लेकिन अब नई पीढ़ी यह बर्दाश्त नहीं करेगी और पहला पत्थर उस जमींदार के अभेद्य दुर्ग पर फेंककर उसकी खिड़की का कांच तोड़ देता है जिसकी ओर देखने की किसी में हिम्मत नहीं थी। इस ऐक्ट में इतना कुछ छिपा था जो शायद वह ढाई घंटे की फिल्म नहीं बोल पाई।
दूसरी आजादी का नारा देनेवाले जयप्रकाश नारायण रहे हों या संपूर्ण क्रांति के पक्षधर राममनोहर लोहिया या फिर सबसे ताजातरीन आंदोलक अन्ना हजारे, हर क्रान्ति का पेट्रोल युवाओं की धमनियों से ही आया है। मेक इन इंडिया के तहत सरकार ने स्टार्ट-अप योजना पेश की थी लेकिन कन्हैया ने तो उसे कुछ अलग ही तरीके से अपनाकर सर जी, का पूरा आइडिया ही खराब कर दिया। एक ही झटके से विडियो-ऑडियो में कट-पेस्ट करनेवालों को पेचिश लग गई। 65% आबादी 35 वर्ष का फॉर्म्युला गिना-गिनाकर सत्ता पाने के बाद क्या उस 35 साल वालों को उसी अनुपात में सत्ता का अधिकार दिया गया? आज जरूरत है कि युवाओं की इस उपस्थिति का एहसास उन्हें फैसला लेने की शक्ति देकर किया जाए।
यह शाश्वत सत्य है कि षड़यंत्रों से युवकों की आवाज कभी दबाई नहीं जा सकती या किसी वर्ग की आवाज दबाकर, उनका माखौल उड़ाकर, तिरस्कार कर और बोलने की आज़ादी की जब कोशिश होगी तब वे उतने ही मुखर बनेंगे। देश इवेंट मैनेजमेंट के सहारे नहीं चलता। वह चलता है भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, समानता और महंगाई को मैनेज करने से। इन मोर्चों पर असफल रहने पर ऐसे ही अरविंदों, राहुलों और कन्हैयों की भरमार होती रहेगी।
कुमार विश्वास की कन्हैया पर बिल्कुल सटीक प्रतिक्रिया थी कि यह छोटा रिचार्ज तो पूरे नेटवर्क को उड़ा देने की क्षमता रखता है। कन्हैया ने सही याद दिलाया कि सीमा पर मारे जानेवाले सैनिक का कभी कोई भाई-भतीजा या रिश्तेदार क्यों राजनीतिज्ञ, मंत्री या बड़े अफसर नहीं निकलता? हर बार उन सैनिकों की शहादत पर उनका ताबूत गांवों-कस्बों में किसान या मध्यवर्ग ही क्यों पहुंचता है? उनकी शहादत पर घड़ियाली आंसू बहानेवाले क्या जाने उस दर्द को?
अभी कुछ महीनों पहले तक तो भक्त यही मान रहे थे कि कांग्रेस की हताशाभरी हार के बाद नेतृत्व पर अगर कोई उंगली उठा सकता है तो वह केवल अरविंद केजरीवाल हैं। लेकिन तब तक शानदार विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ नीतीश कुमार आ धमके। अभी यह जोड़ी बनी थी कि राहुल के नए तेवरों ने ध्यान खींचा और तब तक रोहित वेमुला प्रकरण से दुखी पूरे युवा वर्ग से पंगा ले लिया गया कन्हैया को गिरफ्तार करके। यह एक की गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि उसी 35 की आयुवाले 65% वर्ग से ले ली गई नाराजगी थी।
तमिलनाडु में लिट्टे से सहानुभूति रखनेवाली जयललिता, पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को पनपने दे रहे अकाली दल, कश्मीर में PDP, असम में बोडोलैंड सहित देश में जितने अलगाववादी संगठन है उन सब से सत्ता की खातिर हाथ मिलाना ही क्या राष्ट्रप्रेम है? हीनभावना किसमें है यह देश को बताने की जरूरत है?
राहुल के नेतृत्व क्षमता पर उठे प्रश्न के बदले वास्तव में तो उनकी दाद तो देनी चाहिए कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए विरोध व्यक्त करने के लिए प्रधानमंत्री के अध्यादेश को फाड़ने की हिम्मत की। आज मार्गदर्शक मंडल चिठ्ठी लिखने के अलावा कुछ कर सकता है? कन्हैया की बात में दम है कि लोगों को हीनभावना पर चर्चा महत्वपूर्ण लगती है लेकिन काला धन वापसी, JNU कांड, रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या, हरियाणा के हिंसक जाट आंदोलन, पठानकोट हमला, EPF में टैक्स की बात मन में क्यों नहीं आती?
चलते-चलाते
राष्ट्रप्रेमी चिल्लाने से कोई राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकता। कन्हैया में देशद्रोही तलाशनेवालों सचमुच में राष्ट्रविरोधी पौधा देखना है तो कोई कश्मीर जाकर देखे जहां रोज सैकड़ों युवक मिलेंगे जो खुलेआम भारत के टुकड़े करने का आह्वान करते हैं और तिरंगे को रौंदते/जलाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना है कि यह सब उसी कश्मीर में हो रहा है जहां बीजेपी की सरकार है


#नवभारत टाइम्स

Friday, March 4, 2016

नरेंद्र मोदी और को पीछे छोड़ते हुए कन्हैया कुमार का सोशल मीडिया पर वर्ल्डवाइड ट्रेंड कर जाने के कुछ तो मायने हैं.

कन्हैया जेल से जमानत पर रिहा कर दिये गये. उन पर केंद्र सरकार ने देश से बगावत का इल्जाम लगाया था. कन्हैया के तिहाड़ से निकलते ही जहां जेएनयू समेत पूरे देश में  जश्न का माहौल था वहीं गुरूवार रात होते- होते सोशल मीडिया में हैशटैग कन्हैया कुमार वर्ल्डवाइड ट्रेंड करने लगा.
खास बात यह है कि अमेरिका में उभरते हुए नेता डोनाल्ड ट्रम्प तो ट्रेंड में पीछ छूट ही गये, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में  जोर शोर से दिया गया बजट सत्र का भाषण भी ट्रेंडिंग में पीछे छूट गया.

कन्हैया कुमार की जमानत पर रहिाई की खबर फैलते ही सोशल मीडिया में लाखों लोगो ने अपनी प्रतिक्रिया और कन्हैया के समर्थन में कमेंट करने लगे. भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया, सोशल मीडिया के इस रौ को भांपते हुए मजबूर हुआ और तमाम चैनलों ने अपनी टीम जेएनयू भेज दी जहां कन्हैया की रिहाई का जश्न चल रहा था. इस अवसर पर कन्हैया ने एक घंटे की स्पीच दी और फिर वही नारे लगाये जिन नारों को फेरबदल कर टीवी चैनलों ने देश को सुनाया था- संघवाद से आजादी, मनुवाद से आजादी, मोदी राज से … हम ले के रहेंगे आजादी.
इस भाषण के दौरान कन्हैया ने स्पष्ट किया कि देश के संविधान में उनका पूरा भरोसा है. उन्हें भारत से आजादी नहीं, बल्कि भारत में आजादी चाहिए.
कन्हैया का जेएनयू में दिया गया यह भाषण हजारों की संख्या में लोग शेयर कर रहे हैं. सोशल मीडिया में जो प्रतिक्रियायें आ रही हैं उसमें अधिकतर लोगों का मानना है कि  आरएस, संघवाद, साम्प्रदायिकता, कार्पोरेटवाद के विरोध के प्रतीक के रूप में कन्हैया कुमार नामक युवा मिल गया है

Thursday, March 3, 2016

मुझे देश से नहीं देश में आज़ादी चाहीए : कन्हैया कुमार

कन्हैया कुमार JNU मे

कन्हैया के घर जशन में मोहम्मद मुसलिम और अन्य
जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार गुरुवार शाम तिहाड़ जेल से रिहा हो गए। उन्हें 20 दिन पहले ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कन्हैया को बुधवार के दिन  अदालत ने ज़मानत दी थी। वे जब जेएनयू के परिसर में पहुंचे तो वहां उन्हें छात्रों और शिक्षकों ने उनका ज़ोरदार  स्वागत किया। कन्हैया के स्वागत में बड़ी तादाद में छात्र नारेबाजी कर रहे थे और हाथों में नारे लिखी तख्तियां लिए हुए थे।


कन्हैया ने देर रात कैंपस में भाषण दिया। अपने भाषण में उन्होंने केंद्र सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया। उन्होंने प्रधानमंत्री पर भी निशाना साधा। कन्हैया ने कहा की सरकार जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा हमें भारत से नहीं भारत में आज़ादी चाहीए

उन्होंने अपने भाषण के दौरान भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी याद किया। उन्होंने कहा की उन्हें भारतीय संविधान पर पूरा भरोसा है।  कन्हैया ने अदालत पर भी भरोसा जताया।

आपको बता दें की देशद्रोह के आरोप में 12 फरवरी को कन्हैया की गिरफ्तारी हुई थी। कन्हैया पर आरोप है कि उन्होंने जेएनयू परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में देश विरोधी नारे लगाए थे। कन्हैया ने इस आरोप से बार-बार इनकार किया है।

उधर, दिल्ली सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में नौ फरवरी को आयोजित एक कार्यक्रम में हुई देश-विरोधी नारेबाजी और जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार में कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया है।




Tuesday, March 1, 2016

भाजपा देश में हिन्दू राज्य की विचारधारा थोपने का प्रयास कर रही है-येचुरी



सीपीआई (एम) नेता सीताराम येचुरी ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह देश में हिन्दू राज्य की अपनी विचारधारा थोपने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप से बाज आए और छात्रों पर शिकंजा करने से परहेज करे।
दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों की गिरफ्तारी पर पैदा विवाद पर उन्होंने सरकार से मांग की कि वह हाउस समिति संगठित करे ताकि विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों में होने वाली हर तरह के बदलाव की समीक्षा की जा सके ।
सीताराम येचुरी ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां एक सक्योलर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित है लेकिन इसको हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश की जा रही है। और इसी उद्देश्य के तहत छात्रों को परेशान किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में सरकार का हस्तक्षेप बेजा और अवैध है।
उन्होंने राष्ट्रवाद की आड़ में की जाने वाली कार्रवाइयां को गंभीर मामला करार दिया और अपने बयान में सरकार से सख्त सवाल किया कि 'क्या सरकार का विरोध करने वाला विपक्ष को भी देशद्रोही करार दिया जाएगा ?

Monday, February 22, 2016

'जेएनयू की जिस छात्रा की पुलिस को तलाश, वह है बिहार के भोजपुर की शान

चिंटू कुमारी 

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में देश विरोधी नारे लगने की घटना के बाद दिल्ली पुलिस पूछताछ के लिए छात्रसंघ की जिस पूर्व जनरल सेक्रटरी चिंटू कुमारी की तलाश कर रही है, वह भोजपुर जिले स्थित कोलोडिहरी गांव के हरिजन टोला की शान हैं।

चिंटू जब पढ़ाई के लिए दिल्ली आई थीं तब इसमें सीपीआई(एम-एल) ने काफी मदद की थी। बाद में उनका दाखिला जेएनयू में हुआ जहां वह एमफिल कर रही हैं। 20 साल की चिंटू 2014 में ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स असोसिएशन (आईसा) के टिकट पर छात्रसंघ का चुनाव लड़कर जनरल सेक्रटरी बनी थीं।

चिंटू के पैरंट्स आईसा के पैरंट ऑर्गनाइजेशन सीपीआई (एम-एल) के सदस्‍य हैं। बिहार में जब जातिवाती हिंसा का खूनी दौर चल रहा था और रणवीर सेना ने 1996 में जब बथानी टोला नरसंहार को अंजाम दिया था तब उनके पिता रामलखन ने छिपकर अपनी जान बचाई थी। मजदूरी में बढ़ोतरी की मांग को लेकर वह खेतिहर मजदूरों के आंदोलन का नेतृत्‍व कर चुके हैं जिसकी वजह से ऊपरी तबके के लोगों में उनके खिलाफ गुस्‍सा था।


चिंटू की मां सरोजिनी रोजी-रोटी के लिए चूड़‍ियां बेचने का काम करती हैं। वहीं उनसे छोटी दो बहनें सीपीआई (एम-एल) की मदद से ही दिल्‍ली में पढ़ाई कर रही हैं। उनके भाई संदीप आरा के सीपीआई(एम-एल) दफ्तर में ही रहते हैं और कॉलेज की पढ़ाई कर रहे हैं।

जब सरोजिनी को जेएनयू की घटना के बारे में पता चला तो वह काफी परेशान हो गईं। अपनी बेटी को देशद्रोही करार दिए जाने से वह काफी दुखी हैं। उन्‍होंने कहा, 'हमने सिर्फ यही चाहा कि हमारे बच्‍चे पढ़-लिख जाएं ताकि वे देश की सेवा कर सकें। हमने यह कभी नहीं चाहा कि वे कमाकर हमें खिलाएं या फिर हमारे लिए घर बनवाएं।' सरोजिनी ने कहा कि उनका परिवार तहेदिल से लेफ्ट विचारधारा को मानता है, लेकिन वे देशद्रोही नहीं हैं।

सरोजिनी ने अपनी बेटी को देशद्रोही करार दिए जाने के लिए केंद्र सरकार को जिम्‍मेदार ठहराया। जब चिंटू के सरेंडर करने की बात पूछी गई तो उन्‍होंने सवाल खड़े किए और पूछा कि उसे सरेंडर क्‍यों करना चाहिए। उन्‍होंने कहा, 'वह इसलिए सरेंडर करे ताकि भगवा ब्रिगेड से जुड़े काले कोट वाले लोग पुलिस के सामने उसकी पिटाई करें जैसा कि उसके दोस्‍त कन्‍हैया कुमार की हुई।' एनबीटी

Friday, February 19, 2016

JNU विवाद:पूरे बिहार के छात्र एवं युवा कन्हैया के साथ खड़े है-तेजस्वी

पटना। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जेेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पर देशद्रोह के आरोप लगाने के मामले पर बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा है कि देशभक्ति की ठेकेदारी तो केवल केंद्र में बैठे लोगों के पास है, दूसरी पार्टी के लोग तो देशद्रोही हैं। तेजस्वी ने कहा कि यह विचारधारा की लड़ाई है। इसमें किसी पर हमला और न्याय की बात कहां से आ गई? इस बारे में हमें प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है।
इससे पहले तेजस्वी ने सोशल मीडिया पर अपने 'दिल की बात' सीरीज में भाजपा पर जमकर हमला किया। तेजस्वी ने ट्वीट किया, "भाजपाई छद्म राष्ट्रवाद की विफलता को उजागर करने के लिए मै दिल की बात के साथ हाजिर हूं। इसके तहत लेखों को पढकर आप इस बारे में अपनी प्रतिक्रियो दे सकते हैं।"
  "बिहार के कन्हैया कुमार का क्या दोष था? बीजेपी कभी साबित नहीं कर पायेगी।
पूरे बिहार के छात्र एवं युवा कन्हैया के साथ खड़े है।"
अपने अगले ट्वीट में तेजस्वी ने लिखा है कि बीजेपी को युवाओं के डेमोक्रेटिक राइट्स व स्पेस में दखलदांजी नहीं करनी चाहिए।
  "BJP युवाओं के डेमोक्रेटिक राइट्स व स्पेस में दखलदांजी बंद करे अन्यथा जिस दिन इस देश के सारे छात्र एवं युवा एक हो गए आपको कोई ठौर नहीं मिलेगी।"
तेजस्वी ने अपने अगले ट्वीट में भाजपा से कहा है कि आपके स्कूल ऑफ़ थॉट से हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
  "हम देशभक्त है,बाबासाहेब के संविधान व लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं। आपके"स्कूल ऑफ़ थॉट" से हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

Wednesday, February 17, 2016

JNU : अपना नाकामी छिपाने के लिए खुन का खेल

प्रकाश नारायण सिंह

सियासत के कायदे वही हैं जो राजनीति को रास्ता दिखाएं. जीत के जज्बे को पैदा करने से लेकर सत्ता हथियाने तक धर्म, जाति और ‘राष्ट्रवादी हुंकार’ एक अहम जरिया रहा है.

जब आप जीते थे तो आप सभी की स्याही से सूबे की तकदीर लिखने की उम्मीद थी. आप लोगों की महत्वकांक्षा के नाग ने सच्चे लोकतंत्र को, गरीबी को, भूख को, सुरक्षा को, इंसानियत को, मानवता को डंस लिया. हां, हमारे सियासी मालिक आप ही की बात कर रहा हूं. भय को, भूख को, भ्रष्टाचार को दफनाने के बजाए आप सभी ने हमारी उम्मीदों को दफना दिया. हमने तो आपको अपना हुक्मरान माना, आपको सिर आंखों पर बैठाया, अपनी समस्याओं का समाधान बनाया लेकिन आप उत्पीड़ित अस्मिताओं के निर्मम शोषण का उपकरण बन गए सियासी मालिक.. बताइए ना हमसे चूक कहां हो रही है. समझाइए अब हम क्या करें..

राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट आप तो मत ही दीजिए?

फिलहाल ‘हस्तिनापुर’ की सियासत कठघरे में है. विकास के मुद्दे पीछे छूट गए. धर्म और ‘राष्ट्रवादी हुंकार’ का कॉकटेल बनाया जा रहा है. आम लोगों के मुफलिसी के इस दौर में महंगी आलीशान गाड़ियों में सुरक्षा घेरे के बीच चलना और सियासी शिगूफे छोड़ अपना वर्चस्व साबित करने की कोशिश करना कथित राष्ट्रवादी और धार्मिक ठेकेदारों का अहम पेशा रहा है. ठेकेदारी की ये दुकान छोटी से लेकर बड़ी तक है. जिसकी जैसी दुकान उसकी सियासत में उतनी हिस्सेदारी. विहिप, बजरंग दल से शुरू हुई ये सियासी सेना श्रीराम सेना, ये सेना वो सेना पता नहीं कौन कौन सेना तक बन गई…..आजकल तो हमारे यूपी में तीर धनुष की ट्रेनिंग दी जा रही है आईएसआईएस से लड़ने के लिए.. अरे भाई जब तीर धनुष ही काफी हैं तो भारतीय सेना क्या धान काटेगी? क्या इनको भारतीय सेना पर भरोसा नहीं रहा? खैर.. फिलहाल मुद्दा ये नहीं है.

मैं पहले ही साफ कर दूं कि संविधान के खिलाफ हर नारे का मैं विरोध कर रहा हूं. लेकिन इन नारों के सहारे जो सियासत हो रही है उसे बेहद खतरनाक मानता हूं. बंद करिये सर्टिफिकेट देना.. ये देशद्रोही वो देशद्रोही.. मैं ज्यादा राष्ट्रभक्त.. मैं हिन्दू भक्त.. मैं फलां भक्त.. अरे मैं से बाहर निकलिए और हम के बारे में सोचिए. जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय से रोशनी निकलती है. और रोशनी का वजूद ही अंधेरे के खिलाफ प्रतिरोध है. धर्मांध और कट्टर लोगों के मन में इस विश्विद्यालय के लिए बराबर नफरत क्यों पलती है? शटडाउन जेएनयू का हैशटैग कितना खतरनाक है ये सोचकर ही मन कांप जाता है. राष्ट्रवादी समय में ‘हम’ और ‘वो’ शब्द बेहद शातिरता के साथ इस्तेमाल किए जा रहे हैं. आम लोगों और देश के बीच की रेखा को भी धुंधला किया जा रहा है. बस जो आपके विचार के साथ नहीं है वह देशद्रोही. ये कैसा सर्टिफिकेटवाद है साहब. मेरा सिंगल सवाल.. नारों के मास्टर माइंड को पकड़ने के लिए क्या अब एफबीआई के जवान आएंगे! आपकी रॉ से लेकर दिल्ली पुलिस तक के हत्थे वह क्यों नहीं चढ़ रहा है? दिल्ली पुलिस महज चंद घंटे में जेएनयू के प्रेसिडेंट कन्हैया को गिरफ्तार करती है जिसका नारे लगाते कोई अभी तक वीडियो भी नहीं आया लेकिन जो नारे लगा रहे थे उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. उनको आप गिरफ्तार करने से क्यों बच रहे हैं. हमें पता है कि कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के लिए बन रहे माहौल में दिक्कत आएगी. सत्ता के लिए देशभक्ती का तड़का मत लगाइए. ये आग से मत खेलिए हुजूर.. आपके बच्चे तो ऑक्सफोर्ड में पढ़ते हैं. कमांडों की सुरक्षा के बीच में रहते हैं.. हमारे बच्चे जलेंगे.. मरेंगे.. और कटेंगे.

कानून के रक्षक संस्कृति के रक्षक बन कर पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों के साथ मारपीट की. और उतना ही नहीं आपके विधायक जी तो ऐसे ‘कथित आत्मरक्षा’ में पीटाई करने लगे जैसे मुंबईया डॉन हों. वकीलों की आड में आपके ‘सेवकों’ की करतूत से भारत मां गौरवान्वित होंगी.. क्यों हुई होंगी न.. बोलिये ना.. आप नहीं बोलेंगे क्योंकि आपको उतना ही बोलना है जिससे की सत्ता हथियाने में सफलता मिलती रहे. हमें पता है कि निरंकुश होने की चाह वाली किसी भी सत्ता की आंख में सबसे पहले पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी ही खटकते हैं. क्योंकि यही वे लोग हैं जो सत्ता की पोल खोलते हैं. जनता की आवाज को सत्ता के गलियारे में शोर बनाते हैं. और मधुर संगीत के साथ सोमरस में डूबी मदहोश सत्ता को कर्कश शोर से चिढ़ होती है.

लोकतंत्र का ये हिस्सा भी पढ़ लीजिए!

मुझे तो बस इतनी भर इल्तिजा करनी है कि शोर और चीत्कार के बीच कुछ आवाजें कहीं सहमी और दुबकी हुई हैं. बेआवाज की मानिंद बस उस बेआवाज की आवाज सुन लीजिए. बेशक होंठ सिले नहीं गए हैं लेकिन आपके गुंडों की खौफ से लरज रहे हैं. आप समझ रहे हैं न..आप तो मजलुम के घर पैदा हुए थे. आप गरीब और कमजोर के डर को महसूस कर रहे हैं साहेब.

सुनिए जवाहरलाल नेहरू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया की मां ने कहा है, “हमें जब से पता चला है कि कन्हैया को गिरफ्तार कर लिया गया है, तब से हम लगातार टीवी देख रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि पुलिस उसे बहुत ज्यादा नहीं पीटेगी. उसने कभी भी अपने माता पिता का अपमान नहीं किया, देश की बात तो भूल ही जाइए. कृपया मेरे बेटे को आतंकवादी नहीं बोलिए. वह यह नहीं हो सकता है.” मीना एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं और साढ़े तीन हजार रूपये प्रति माह कमाती हैं. उनके 65 वर्षीय पति लकवाग्रस्त होने की वजह से सात सालों से बिस्तर पर हैं.

आप तो संसद में घुसे तो कैमरे की चमकती रोशनी में माथा टेका. कसम से.. मेरा दिल भर आया. मैं उसे ड्रामा नहीं समझा. चलिए अब आपको कुछ लोकतंत्र का इतिहास दिखाता हूं. देख लीजिएगा चश्मा साफ करके. 1965 में जब अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था, तब अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में ही ऐसे लेक्चर्स की शुरूआत की जिसमें लड़ाई के खिलाफ बातें की जाती थीं. लेकिन उनके इस विरोध को न ही देशद्रोह माना गया और न उन पर कोई कार्रवाई हुई बल्कि यूनिवर्सिटी ने उन्हें उसे जारी रखने की इजाजत दे दी.

1965 से 1973 के बीच पूरे अमेरिका के विश्वविद्यालयों में वियतनाम युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे, छात्रों ने इस दौरान अमेरिकी झंडे भी जलाए. लेकिन तब भी किसी पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं किया गया. सिर्फ उन छात्रों को गिरफ्तार किया गया जो सीधे तौर पर हिंसा में शामिल थे. इसी तरह फरवरी 2003 में इराक युद्ध के खिलाफ भी अमेरिकी विश्वविद्यालयों में छात्रों ने प्रदर्शन किया लेकिन तब भी छात्रों के उस विरोध को देशद्रोह की श्रेणी में नहीं रखा गया.

आर्थिक मुदे पर नाकाम है सरकार?

अब हम आपको बताएंगे कि जेएनयू जैसे विवाद अब रोज आप क्यों चमकाएंगे. खैर चलिए कुछ उस पर आपका ध्यान दिला दूं जो आपको करना था लेकिन किये क्या.. देश की आर्थिक नब्ज बताने वाले शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स फिसलकर उस स्तर से भी नीचे पहुंचा हुआ है, जिस स्तर पर मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी. प्रसिद्ध इतिहासकार राचंद्र गुहा के इस ट्वीट पर ध्यान दीजिए..

The comments by the Home and HRD Ministers on JNU only demonstrate that in this Cabinet, patriotism is the first refuge of the incompetent.

— Ramachandra Guha (@Ram_Guha) February 13, 2016
रुपया भी सबसे निचले स्तर के करीब है. एक डॉलर की कीमत करीब 68 रुपए है. औद्योगिक विकास दर भी लाल निशान दिखा रहा है. मई 2014 में 4.7 फीसदी रहने वाली औद्योगिक विकास दर दिसंबर में माइनस 1.3 फीसदी रही. इस साल आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी का अनुमान भी भी घटाकर सात से साढ़े सात फीसदी के बीच कर दिया गया है. पहले इसके आठ से साढे आठ फीसदी के बीच रहने का अनुमान था. सरकारी बैंकों का बढ़ता घाटा भी मोदी सरकार की मुश्किल बढ़ा रहा है. दिसंबर में खत्म तिमाही में आठ सरकारी बैंकों का घाटा कुल मिलाकर दस हजार करोड़ के पार पहुंच गया है.

सरकार ने पिछले बजट में राजस्व घाटा 3.9 फीसदी तक ले आने का अनुमान रखा था. लेकिन एक तो सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने से उम्मीद से कम कमाई हुई है. वहीं सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के साथ-साथ वन रैंक वन पेंशन के लिए अतिरिक्त प्रावधान करने के मोर्चे पर भी परेशानी है. इसका हल सरकार किस तरह निकालती है, ये तो 29 फरवरी के बजट से साफ हो सकेगा. साल 2015-16 में आयकर और कॉरपोरेट टैक्स जैसे डायरेक्ट टैक्स से कमाई में भी 40 हजार करोड़ की कमी आने का अनुमान है. हालांकि पेट्रोल और डीजल पर लगातार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर और सर्विस टैक्स जैसे इनडायरेक्ट टैक्स से सरकार किसी तरह तय लक्ष्य के मुताबिक कमाई कर पाएगी. काले धन के मोर्चे पर भी सरकार उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. विपक्ष के आरोपों के बीच उद्योग जगत भी दबे मुंह कह रहा है कि योजनाएं जारी करने से ज्यादा उनके अमल पर ध्यान देने की जरूरत है.

वोटों की गुल्लक भरने वाली सियासत!

‘कांइयापन’ के ‘स्विंग’ से अक्सर हम भोले हार जाते हैं! वोटों की गुल्लक को भरने के लिए रथयात्रा निकाले गए. दो भाइयों को हिन्दू और मुसलमान में बांटा गया. तहजीब पर कई जगहों पर दंगों के रूप में तमाचे पड़े. ये देश अंदर और बाहर से आग में धधकने लगा. कई जगहों पर इंसानियत को गहरे जख्म मिले. और फिर शुरू हुई वोटों की फसल काटने का सिलसिला..हर चुनाव में.. या जब आर्थिक नाकामी घेरती है तो राष्ट्रभक्ती जागती है. गाय भक्ती तो बिहार चुनाव में जगी ही थी. उससे पहले यूपी विधानसभा चुनाव में लव जिहाद का लिटमस टेस्ट फेल हुआ था.

‘हम भारत के लोग’ पता नहीं कब जाति, धर्म और ‘हुंकार’ पर समझदार होंगे. हम कब भूख, भय और भ्रष्टाचार पर सही समय पर सही निर्णय लेंगे? हम कब वोट की चोट को व्यवस्था के कोढ़ पर मारेंगे? मुझे समझ नहीं आता कि हम कब सच्चे अर्थों में ‘लोकतंत्र का राजा’ बनेंगे?


Sunday, February 14, 2016

मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं, वो हिंदुत्व की राजनीति का शिकार : कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह

पटना। राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार के माता-पिता का कहना है कि उनका बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है, वह हिंदुत्व की राजनीति का शिकार हुआ है। कन्हैया कुमार के पिता जयशंकर सिंह ने शनिवार को कहा, “मेरा बेटा राष्ट्र विरोधी नहीं है। उसकी राष्ट्र विरोधी विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं उठता। वह अपनी उम्र के हजारों युवाओं के समान ही राष्ट्रवादी है।”
कन्हैया कुमार की मां मीना देवी ने कहा कि उनका बेटा राष्ट्रवादी है, लेकिन वह आरएसएस-भाजपा की हिंदूवादी राजनीति का समर्थक नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें उसकी विचारधारा पर गर्व है। इसमें कुछ गलत नहीं है। वह दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ लड़ रहा है और इसीलिए उसे निशाना बनाया गया है।” कन्हैया कुमार के माता-पिता बिहार के बेगूसराय जिले के मसलानपुर गांव में रहते हैं। यह जिला वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता है।

सिंह ने कहा कि उनके बेटे को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया है। “वह वामपंथी पार्टी का कार्यकर्ता है और विरोधी पार्टी उसके खिलाफ गंदी राजनीति कर रही है।” कन्हैया की मां ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि उनका बेटा इस हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ लड़ाई जीत जाएगा।

कन्हैया के पैतृक स्थान के अधिकांश ग्रामीणों ने उसकी गिरफ्तारी को लेकर दुख जताया है। गौरतलब है कि कन्हैया कुमार को कथित तौर पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने की बरसी पर जेएनयू के छात्रों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है।

Saturday, February 13, 2016

JNU अध्यक्ष की गिरफ्तारी, लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला , जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सम्मानित करेगा रिहाई मंच

एसएफआई दफ्तर पर हमला करने वाले एबीवीपी के गुण्डों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए


लखनऊ 12 फरवरी 2016। रिहाई मंच ने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को  देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की कड़ी निंदा की है और इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हुए जेएनयू अध्यक्ष को सम्मानित करने का ऐलान किया है। मंच ने लखनऊ स्थित स्टूडेन्ट फेडरेशन आॅफ इंडिया (एसएफआई) के दफ्तर पर एबीवीपी के गुण्डों द्वारा हमले को संघ परिवार की दहशतगर्दी का एक और उदाहरण बताया है। 


रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि अफजल गुरू की फांसी जिसपर पूरी दुनिया में देश की न्यायपालिका की बदनामी हो चुकी है, पर अगर किसी विश्वविद्यालय में छात्र बहस करते हैं तो इसे उनके लोकतांत्रिक अधिकार के तहत जोड़कर देखा जाना चाहिए। दिल्ली में झंडेवालान में जिस तरह से महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस के साथ मिलकर संघी गुण्डों ने मारा-पीटा जिसके वीडियो होने के बावजूद आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई वो साबित करता है कि राज्य की पूरी मशीनरी संघ के एजेण्डे पर काम कर रही है। जिस संघ परिवार का आजादी की लड़ाई में अग्रेजों के साथ मिली भगत का इतिहास रहा है, जिसका सिद्धांतकार माना जाने वाला सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से रिहा हुआ हो, कांग्रेस में रहने के दौरान जेल जाने पर जब सभी कांग्रेसी हफ्तों आमरण अनशन पर बैठे हों जिसके कारण उनक वजन कम हो चुका हो तब हेडगेवार का जेलर से मिली भगत करके खाना खाना और अपना वजन 8 किलो बढा़ लिया हो और जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेई ने 1942 में पुलिस की मुखबिरी करके क्रांतिकारी नेता लीलाधर वाजपेई को जेल भेजवा दिया हो उनसे बड़ा देशद्रोही आतंकी संगठन कोई नहीं है। इसलिए अफजल गुरू की फांसी पर बहस करने वाले छात्रों के बजाए संघियों को देश द्रोह के आरोप में जेल में ठूसा जाना चाहिए। 


रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि जिस संघ परिवार के लोगों का नाम देश भर में हुए आतंकी घटनाओं में नामजद है, जिसके नेता मोदी की तस्वीर असीमानंद जैसे दुर्दांत आतंकी के साथ सार्वजनिक हो चुकी हो, जिसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृहमंत्री राजनाथ सिंह की महिला आतंकी साध्वी प्रज्ञा के साथ गोपनीय बैठक की तस्वीर हो, जिसके लोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे की पूजा करते हों उस संगठन का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। इस देशद्रोही विचारधारा का विरोध करने वाला हर व्यक्ति देश भक्त है। जेएनयू अध्यक्ष ने फासिस्ट निजाम के खिलाफ जो संघर्ष किया है उसके लिए रिहाई मंच कन्हैया कुमार का नागरिक अभिनंदन कर सम्मानित करेगा।


रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने लखनऊ विधानसभा स्थित एसएफआई कार्यालय पर एबीवीपी द्वारा किए गए हमले को पूरे देश पर हो रहे भगवा हमले का ताजा उदाहरण बताया है। जिस तरह एबीवीपी के गुण्डों ने एसएफआई दफ्तर में लगी शहीद ए आजम भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल की तस्वीरें तोड़ीं वह साबित करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अंगे्रजों की दलाली करने वाले संघी उस आंदोलन के नायकों से कितना नफरत करते हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे अग्रेजों से माफी मांगने वाले संघी सावरकर की असली औलाद हैं। भारतीय संस्कृित और महिलाओं की बड़ी-बड़ी बात करने वाले लोगों ने महिला नेता सीमा राना के साथ मारपीट करके अपने महिला विरोधी चरित्र को फिर उजागर किया है। घटना के बाद एसएफआई के कार्यकताओं से मुलाकात करके लौटे रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने कहा कि ठीक विधानसभा के सामने स्थित एसएफआई कार्यालय पर संघी गुण्डों द्वारा किया गया हमला बताता है कि सपा सरकार इन दहशतगर्दों को संरक्षण दे रही है। मंच ने मांग की कि दोषियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए। उन्होंने मांग की है कि विधानसभा के ठीक सामने स्थित भाजपा कार्यालय को तत्काल वहां से हटाकर विधानसभा की सुरक्षा को पुख्ता किया जाए। उन्होंने मांग की कि प्रदेश में संघ व भाजपा कार्यालयों पर सरकार सीसीटीवी कैमरा लगवाकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखे। क्योंकि इन्हीें दफ्तरों से पूरे सूबे में सांप्रदायिक दहशतगर्दी और दंगों की रणनीति रची जाती है।