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Saturday, February 13, 2016

JNU में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे ABVP ने लगाए, सबुत के तौर पर वीडियो जारी






9 फरवरी की शाम अफज़ल गुरू की याद में हुए प्रोग्राम के बाद प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सुर्खियों में है। देश में राष्ट्रीय समाचार चैनलों का एक गुट जेएनयू और वहां पर सक्रिय वामपंथी संगठनों पर हमलावर है। समाचार चैनलों के कुछ एंकर इस विश्वविद्यालय को खुलेतौर पर देशद्रोहियों का गढ़ कह रहे हैं। जेएनयूएसयू के मौजूदा प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद ऐसे चैनलों को अपने अजेंडा में कामयाबी भी मिल रही है।

हालांकि इसी दौरान सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में ऐसे न्यूज़ चैनलों को एक्सपोज़ करने के अलावा एबीवीपी पर भी सनसनीखेज़ आरोप लगाए गए हैं। वायरल वीडियों में दावा किया गया है कि 9 फरवरी की रात जेएनयू कैंपस में वामपंथी छात्रों को फंसाने के मकसद से एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे।

'द कंस्प्रेसी' नाम से जारी इस वीडियो के मुताबिक 'जेएनयू के बारे में मीडिया जो दिखा रहा है, वह पूरी तरह से बायस्ड, अधूरा और सनसनीखेज है। वीडियो में जब पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे हैं, उस वक्त स्क्रीन पर एबीवीपी के कार्यकर्ता दिख रहे हैं। इसके बाद जब पीछे से पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारों की आवाज़ आ रही है तो वीडियो में दिख रहे एबीवीपी कार्यकर्ता जवाब में ज़िंदाबाद जिंदाबाद बोल रहे हैं।


वीडियो में मीडिया पर सवाल खड़ा करते हुए कहा गया है कि वह पूरा सच नहीं दिखा रहा है। दावा यह भी किया गया है कि यह एबीवीपी की साज़िश है ताकि गैर एबीवीपी छात्रों पर झूठे मुकदमे दर्ज करवाए जा सकें

कन्हैया की गिरफ्तारी ने ABVP, संघ और वर्तमान सरकार के स्पष्ट चेहरे को सामने ला दिया है। यह गिरफ़्तारी JNU के भविष्य और देश के लोकतंत्र के लिये खतरा। AIYFबिहार राज्य परिषद

कन्हैयार कुमार  कि गिरफ्तारी ने ABVP, संघ और वर्तमान सरकार के स्पष्ट चेहरे को सामने ला दिया है। यहJNU U के भविष्य और देश के लोकतंत्र के लिये खतरा। AIYF राज्य परिषद बिहार  इसकी घोर निंदा करती है।
ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन की बिहार राज्य परिषद जके सचिव  संजिव कुमार सिंह दुने जारी बेयान में कहा वाहर विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी एवं पिछले दो दिनों से ABVP एवं वर्तमान भाजपा सरकार की और से जो JNU को बद्नाम करने की शाजिशें रची जा रही है उसका घोर निंदा करती है। 
     जैसा की हमसब और पूरे देश की जनता JNU के इतिहास एवम् उसकी प्रगतिशील परंपरा को जानते है जो की दशकों से संघ परिवार और आज की वर्तमान सरकार के लिए लगातार चुनौती बनी हुयी है। उसी का परिणाम था कि संघ नेता सुब्रमण्यम स्वामी एवम् उसका मुख्य पत्र पञ्चजन्य ने आज से पांच महिने पहले हीं JNU को आतंकबाद का गढ़ कहा था और देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र कहा था। और आज जब देश रोहित को न्याय की मांग कर रही है तो ABVP के हुड़दंग एवम् कुछ अज्ञात, नकबपोस चेहरे के नारे का बहाना बना JNU को पूनः बदनाम करने, वहां के लोकतांत्रिक माहोल को खत्म करने और छात्र आंदोलन को दमित करने का प्रयास कर रही है।
         AIYF कन्हैया की गिरफ़्तारी और इस पूरे घटना क्रम में ABVP, संघ, पूर्वी दिल्ली के भाजपा संसद महेश गिरी और आज के गृहमंत्री की करवायी जाहिर करती है कि JNU को बड़ी साजिश का हिस्सा बना वहां के लोकतांत्रिक माँहोल एवम् आंदोलनों को खत्म करने का प्रयाश है जिसे देश के विद्यार्थियों एवम् जनता को पूरी तरह वेनकाब करते हुए JNU एवम् देश के लोकतंत्र के रक्छा की अपील करते हैं।
     इसके साथ उन अज्ञात नकबपोस लोगों के नारों की निंदा करते हुए सरकार से उनकी पहचान कर फॉरन गिरफ़्तारी की मांग करते हैं। हमें ताज्जुब है कि जो लोग वर्षों से खुले में नारे लगते हुए देश एवम् देश की जनता के सवालों को उठाते रहे, और जो उस संगठन से जुड़ा है जो देश को आजाद करने के लिए असंख्य कुर्बानियां दी उस संगठन के नेता को देशद्रोही के आरोप मेँ गिरफ्तार किया गया है और हुड़दंग करने बाले, हमला करने बाले और नकबपोस खुले घूम रहे हैं।


JNU अध्यक्ष की गिरफ्तारी, लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला , जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सम्मानित करेगा रिहाई मंच

एसएफआई दफ्तर पर हमला करने वाले एबीवीपी के गुण्डों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए


लखनऊ 12 फरवरी 2016। रिहाई मंच ने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को  देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की कड़ी निंदा की है और इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हुए जेएनयू अध्यक्ष को सम्मानित करने का ऐलान किया है। मंच ने लखनऊ स्थित स्टूडेन्ट फेडरेशन आॅफ इंडिया (एसएफआई) के दफ्तर पर एबीवीपी के गुण्डों द्वारा हमले को संघ परिवार की दहशतगर्दी का एक और उदाहरण बताया है। 


रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि अफजल गुरू की फांसी जिसपर पूरी दुनिया में देश की न्यायपालिका की बदनामी हो चुकी है, पर अगर किसी विश्वविद्यालय में छात्र बहस करते हैं तो इसे उनके लोकतांत्रिक अधिकार के तहत जोड़कर देखा जाना चाहिए। दिल्ली में झंडेवालान में जिस तरह से महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस के साथ मिलकर संघी गुण्डों ने मारा-पीटा जिसके वीडियो होने के बावजूद आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई वो साबित करता है कि राज्य की पूरी मशीनरी संघ के एजेण्डे पर काम कर रही है। जिस संघ परिवार का आजादी की लड़ाई में अग्रेजों के साथ मिली भगत का इतिहास रहा है, जिसका सिद्धांतकार माना जाने वाला सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से रिहा हुआ हो, कांग्रेस में रहने के दौरान जेल जाने पर जब सभी कांग्रेसी हफ्तों आमरण अनशन पर बैठे हों जिसके कारण उनक वजन कम हो चुका हो तब हेडगेवार का जेलर से मिली भगत करके खाना खाना और अपना वजन 8 किलो बढा़ लिया हो और जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेई ने 1942 में पुलिस की मुखबिरी करके क्रांतिकारी नेता लीलाधर वाजपेई को जेल भेजवा दिया हो उनसे बड़ा देशद्रोही आतंकी संगठन कोई नहीं है। इसलिए अफजल गुरू की फांसी पर बहस करने वाले छात्रों के बजाए संघियों को देश द्रोह के आरोप में जेल में ठूसा जाना चाहिए। 


रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि जिस संघ परिवार के लोगों का नाम देश भर में हुए आतंकी घटनाओं में नामजद है, जिसके नेता मोदी की तस्वीर असीमानंद जैसे दुर्दांत आतंकी के साथ सार्वजनिक हो चुकी हो, जिसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृहमंत्री राजनाथ सिंह की महिला आतंकी साध्वी प्रज्ञा के साथ गोपनीय बैठक की तस्वीर हो, जिसके लोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे की पूजा करते हों उस संगठन का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। इस देशद्रोही विचारधारा का विरोध करने वाला हर व्यक्ति देश भक्त है। जेएनयू अध्यक्ष ने फासिस्ट निजाम के खिलाफ जो संघर्ष किया है उसके लिए रिहाई मंच कन्हैया कुमार का नागरिक अभिनंदन कर सम्मानित करेगा।


रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने लखनऊ विधानसभा स्थित एसएफआई कार्यालय पर एबीवीपी द्वारा किए गए हमले को पूरे देश पर हो रहे भगवा हमले का ताजा उदाहरण बताया है। जिस तरह एबीवीपी के गुण्डों ने एसएफआई दफ्तर में लगी शहीद ए आजम भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल की तस्वीरें तोड़ीं वह साबित करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अंगे्रजों की दलाली करने वाले संघी उस आंदोलन के नायकों से कितना नफरत करते हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे अग्रेजों से माफी मांगने वाले संघी सावरकर की असली औलाद हैं। भारतीय संस्कृित और महिलाओं की बड़ी-बड़ी बात करने वाले लोगों ने महिला नेता सीमा राना के साथ मारपीट करके अपने महिला विरोधी चरित्र को फिर उजागर किया है। घटना के बाद एसएफआई के कार्यकताओं से मुलाकात करके लौटे रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी और अनिल यादव ने कहा कि ठीक विधानसभा के सामने स्थित एसएफआई कार्यालय पर संघी गुण्डों द्वारा किया गया हमला बताता है कि सपा सरकार इन दहशतगर्दों को संरक्षण दे रही है। मंच ने मांग की कि दोषियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए। उन्होंने मांग की है कि विधानसभा के ठीक सामने स्थित भाजपा कार्यालय को तत्काल वहां से हटाकर विधानसभा की सुरक्षा को पुख्ता किया जाए। उन्होंने मांग की कि प्रदेश में संघ व भाजपा कार्यालयों पर सरकार सीसीटीवी कैमरा लगवाकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखे। क्योंकि इन्हीें दफ्तरों से पूरे सूबे में सांप्रदायिक दहशतगर्दी और दंगों की रणनीति रची जाती है।  







Friday, February 12, 2016

बिहार में 87000 स्कुल शिक्षक हर दिन मारते हैं बंक


पटना : राज्य के प्रारंभिक स्कूलों में हर दिन करीब 75,000 से 87,000 शिक्षक बिना सूचना के गायब रहते हैं. इसका खुलासा ए. एन. सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के सर्वे में हुआ हैं. 

सरकार की ओर संस्थान द्वारा कराये गये 'टाइम ऑन टास्क' सर्वे में यह साफ है कि स्कूलों में 19-22 फीसदी शिक्षक बिना सूचना के गायब रहते हैं, जबकि राज्य भर में प्रारंभिक स्कूलों में नियोजित व पुराने वेतनमान वाले शिक्षकों की कुल संख्या 3,95,868 है. इस आधार पर देखा जाये तो हर दिन 75,000 से 87,000 शिक्षक बिना सूचना के स्कूल नहीं आते हैं.

राज्य सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इस संबंध में शिक्षा विभाग ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश जारी किया है. शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव डा. डी. एस. गंगवार ने कहा है कि अब अगर शिक्षकों को एक दिन की सीएल (कैजुअल लीव) भी लेनी है तो उन्हें एक दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी. इसके लिए अब शिक्षकों को प्रधानाध्यापक से आवेदन स्वीकृत (अप्लीकेशन एप्रुव) कराना होगा. साथ ही प्रधानाध्यापक भी हर दिन इसकी सूचना देंगे कि अगले दिन कौन-कौन शिक्षक अवकाश पर रहने वाले हैं? प्रधानाध्यपक इसकी सूचना मध्याह्न भोजन योजना की मॉनीटिरंग के लिए बनी आइवीआरएस (इंटरेक्टिव वॉइस रिस्पांस सिस्टम) के जरिये देंगे. प्रधानाध्यापक बतायेंगे कि अगले दिन (अगले कार्य दिवस) कितने शिक्षकों को उन्होंने छुट्टी दी है. इसके बाद अगर संंबंधित स्कूल का निरीक्षण किया जाता है 

और शिक्षकों की छुट्टी की एक दिन पहले बतायी गयी संख्या से ज्यादा शिक्षक अनुपस्थित पाये जाते हैं तो वैसे शिक्षकों को बिना सूचना गायब माना जायेगा और उन पर कार्रवाई की जायेगी. 

डा. गंगवार ने कहा कि बिना सूचना के गायब रहने वाले शिक्षकों से प्रारंभिक स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता बाधक हो रही है. इसलिए गुणवत्ता में सुधार के लिए इस निर्देश का कठोरता से पालन किया जाये. उन्होंने सभी डीइओ को निर्देश दिया है कि वे अपने जिले के सभी डीपीओ, बीइओ, प्रधानाध्यापकों व प्रभारी प्रधानाध्यापकों को इस संबंध में निर्देश जारी करें और इसका सख्ती से इसका अनुपालन करायें.

JNU मामला : एक ही चैनल वहां कैसे तैनात था


ओम थानवी 
आज जेएनयू में कई छात्रों और शिक्षकों से बात हुई। दो छात्र वहां मौजूद थे, जहाँ हल्ला हुआ। दोनों ने कहा कि कश्मीर के नारे वहां लगे, पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नहीं। वीडियो का भरोसा कई लोग न करते मिले, एक ही चैनल वहां कैसे तैनात था यह पहलू भी वीडियो एडिटिंग पर शक पैदा करता है। टीवी चैनल छात्रों के ऐसे आयोजनों को कब कवर करते हैं।
बहरहाल, कोई शिक्षक या छात्र ऐसा नहीं मिला जो पाकिस्तान के नारे लगाने को उचित समझता हो - चाहे वे लगे हों या न लगे हों।
जहाँ तक मेरी अपनी राय है (जिसे बिना जाने ही कुछ अतिउत्साही तो अपने स्वयंभू निष्कर्ष पर भी जा पहुंचे!), तो मेरा स्पष्ट मानना है कि नागरिकों की आजादी का दायरा बहुत व्यापक है। इस तरह छात्रों का भी। अगर वे कश्मीर की आजादी के नारे लगाते हैं, या अफ़ज़ल की फाँसी का विरोध करते हैं तो जहाँ तक उनके अधिकार का सवाल है इस अभिव्यक्ति में कुछ गलत नहीं। हालाँकि मैं कश्मीर की आजादी मांग को उचित नहीं मानता, पर फांसी के विरोध को सही मानता हूँ। ठीक इसी तरह आप या कोई भी उनसे असहमत हो सकता है, यहाँ तक कि कुछ समय बाद उनमें से कोई खुद अपने आप को अलग राय का पा सकता है। जैसा कि कल मैंने लिखा भी कि छात्र जीवन में विचार बनते-बिगड़ते ही आकार लेते हैं।
पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों की पुष्टि भले नहीं हुई, फिर भी अपनी राय साफ रख दूँ - भारत में कोई ऐसे नारे नहीं लगा सकता, लगाए तो सर्वथा अनुचित होगा।
लेकिन एक बदनाम टीवी चैनल के संदिग्ध वीडियो के आधार पर कोई छात्र जमात को ही नहीं, देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय पर ताला जड़ने की बात कहे तो यह दुराग्रह की हद होगी। लोग जानते हैं कि प्रगतिशील विचारों के कारण जेएनयू बरसों से संघ परिवार की आँख की किरकिरी बना हुआ है। अब अपने लोग कोतवाल बने हैं तो हिसाब चुकता करने की बेचैनी मानो बढ़ चली है। अफसोस यही है कि राष्ट्रपिता गांधी के हत्यारे गोडसे का मंदिर बनने पर तो इनका राष्ट्रप्रेम दुबक जाता है, पर छात्रों के एक आयोजन का हल्लाछाप वीडियो देखकर वीरबालक की मुद्रा में विलाप की मानिंद जाग जाता है।


*ओम थानवी के फेस बुक वाल से 

Tuesday, December 22, 2015

जज़्बातों से खेलना बंद करें ।

अरविन्द मंडलोई
जो बात मैं लिखने जा रहा हूँ उसको सिर्फ इस संदर्भ में समझिये कि समाज का जो मनोविज्ञान है वो क्या है ? हर आदमी एक खास मुकाम हासिल कर जिन्दा रहना चाहता है । हर आदमी अपने काम को कर्त्तव्य नहीं समाज पर एहसान मानता है । केन्द्रीय कार्यालयों में सेवारत चपरासी और बाबू भी तथाकथित ईमानदारी से प्राप्त गाड़ियों पर भारत सरकार लिखाकर घूम रहे हैं और जो प्रदेश सरकार के कर्मचारी हैं उनकी गाड़ी के नंबर प्लेट के ऊपर मध्यप्रदेश शासन सुशोभित होकर समाज में उनके महत्वपूर्ण होने का तमगा चस्पा किये सफर में उनके साथ–साथ दिखता है । वो अधिकारी जो जनसेवक होने की कसम उठाते हैंउनके परिवार के सभी लोग घर की सभी गाड़ियों पर लाल–पीली बत्ती लगाकर सड़कों पर अंग्रेजों की तरह आवाजाही करते हैं और गाड़ी में बैठते वक्त अन्दर से बाहर की ओर इस तरह देखते हैं कि जैसे ये गुलाम हमारी सड़कों पर हमारे साथ सफर क्यों कर रहे हैं ? राजनैतिक दलों की हालत यूं है कि वो जनता के प्रतिनिधि नहीं मालिक हो जाना चाहते हैं । घर के बाहर से लेकर चौराहे के पोस्टरों तक भैयाजी, काकाजी छाये हुए हैं । पांच वर्ष पहले तक पुलिस का हिस्ट्रीशीटर गुन्डा भैयाजी बने हुए जन्मदिन की बधाइयां ले रहा है। हार पहने हुए तस्वीर खिंचवा रहा है और देश के एक नंबर से लेकर मोहल्ले के एक नंबर तक नेता उनको जन्मदिन की बधाइयां दे रहे हैं। हर दूसरी गाड़ी विधायक, सांसद लिखकर लोकतंत्र की सड़क पर जनता की आंखों में उड़ती हुई धुल को झोंककर चल रही है ।
मगर इन दिनों ये खेल करवट बदले हुए है और इस बदले हुए खेल में अब साहित्य ने भी अपनी जगह बना ली है । साहित्य से मेरा बेहद निजी लगाव रहा है । मगर उस क्षेत्र में जब इस खेल ने अपनी जगह बनाई है तो मन बहुत दुःखी हुआ है । दुःख तो इस बात का भी है कि एक अजीबो गरीब खाई अपने चरम पर पहुंच चुकी है । भारत और पाकिस्तान की आबादी की अदला–बदली की तरह विचारों की कट्टरता की अदला–बदली ने दंगे और दंगों के बाद शहर में अपनी–अपनी पहचान बनाती बस्तियों की शक्ल इख्तियार कर बैठी है । इन बस्तियों के नाम भी कौमों के नाम पर होने लगे हैं । मानो यहां इन्सान नहीं धर्म भी रहता हो । बिल्कुल ऐसा ही खेल साहित्य के खिचड़ी भी खेल रहे हैं । श्री अशोक वाजपेयी ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया । खबर के साथ मुख्य पृष्ठ पर उनकी तस्वीर थी । जबकि इसके कुछ दिनों पूर्व वे इन्दौर में कविता पाठ करने आये थे और अखबारों में छपी यह तस्वीर बता रही थी कि उनका कविता पाठ सुनने के लिए बामुश्किल 10-20 लोग ही मौजूद थे। फिर पता नहीं कितने नामवर साहित्यकारों ने एक के बाद एक बरसों पहले लिए गये साहित्य अवार्ड दनादन वापिस कर दिये । अचानक साहित्यकारों में एक वैचारिक क्रांति पैदा हो गयी और वे जज्बाती हो गये। पुरस्कार लौटाने वालों में कुछ वामपंथी हैं कुछ शामपंथी हैं । वो जो वामपंथी हैं वो घर के खूबसूरत ड्राइंग रूम में ए.सी. चलाकर रोटी पर खूबसूरत कविता लिखते हैं। भूख और चिथड़ों की शक्ल में गरीबी के दर्द को बयां करते हैं, मगर अपने नौकर को भी तनख्वाह छुट्टी के दिन की काटकर देते हैंऔर बड़ी फ़ेलोशिप और डॉक्टरेट हासिल करते वक्त कभी उनकी विचारधारा आड़े नहीं आती है ।
मल्टीनेशनल कंपनियों के रंगीन चश्मों से वे भारत को देखते हैं । उनके बच्चे विदेशों में शिक्षा हासिल करते हैं । सुख और सुविधाएँ उनके आगे–पीछे चbती हैं और जब अवार्ड लौटाना हो, सुर्खियों में छा जाना हो और कुछ खास बन जाना हो तो वे अचानक कहते हैं कि अरे भाई …. लिखने और बोलने की आजादी छीनी जा रही है । नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, एस. कुलबर्ग जैसे लोग जो अपनी विचारधारा, अपने काम के चलते क़त्ल कर दिये गये, वो lसिर्फ जमीनी काम करते थे ओर उनके शहादत के बाद ही लोगों को पता चला कि वे कितने बड़े लोग थे । इस तरह उनका क़त्ल किया जाना बहुत निंदनीय है । वो कबीर, तुलसी, मीरा, अमीर खुसरो, ग़ालिब, प्रेमचन्द आदि की परंपरा के लोग थे, वो जनता के बीच में से थे । समाज के दर्द और हालात को अपने अन्दर समेट लेने के नतीजे में सदाहत हसन मांटो और मजाज को कम उम्र में मौत ही नसीब नहीं हुई बल्कि जवानी के दिन भी पागलखानों में गुजारना पड़े । पर उनकी मौत के बाद ये अचानक कौन लोग हैं जो सरकार के साथ खेल खेल रहे हैं । इनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने कभी जनता के बीच जाकर काम किया है ? जिसने कभी भूख और रोटी के मध्य अन्तर समझा हो? वो वामपंथी अब कहां हैं जो कभी शैलेन्द्र की शक्ल लिए मजदूरों के बीच जाकर कहते थे कि ”तू जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत में यकीन कर” अली सरदार जाफरी, सज्जाद जहीर, भीष्म साहनी… कहां हैं ये लोग जिन्होंने जनता की आवाज को अपनी आवाज बनाया है ? बाबरी मस्जिद गिराये जाने के बाद कैफी आज़मी दिल्ली की यात्रा पर थे, उसी दिन दिल्ली में बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन था, प्रधानमंत्री ने उन्हें चाय पर आमंत्रित किया था पर वे प्रधानमंत्री के पास चाय पीने नहीं गये, बल्कि उस प्रदर्शन में शरीक हुए जहां जनता उसके गिराये जाने का अफसोस मना रही थी । जिनकी कथनी और करनी एक थी । जो न कभी किसी अवार्ड को लेने के लिए लपके और न लौटाने के लिए भागे । समाज की ये कौन सी अग्रज पीढ़ी है जो मारे जाने वाले साहित्यकार के घर अफसोस जताने नहीं जाती है, सीधे दिल्ली जाती है क्योंकि सुर्खियां सिर्फ दिल्ली में है, ये सारा खेल दिल्ली में है और जो शामपंथी हैं याने कि जो शाम के समय काफी हाउस से घर जाते समय किसी खूबसूरत हेरीटेज में रुकते हुए अंग्रेजी शराब की चुस्कियां लेते हुए ये सोचना शुरु करते हैं कि भाई देश में ये क्या हो रहा है और देश में ऐसा क्यों हो रहा है ? इन्होंने बड़ा गजब किया है, भाई ये लौटा रहे हैं, इनके पास जो है, ये जो इन्होंने हासिल कर लिया है, उसे ये त्याग रहे हैं, उसे ये छोड़ रहे हैं । घर पहुंचते–पहुंचते विचारों का समन्दर पूरे उफान पर आ जाता है और सुबह अखबार उनके विचारों के तुफानोंके गुजर जाने का एहसास हमें एक लेख रुप में करा देते हैं । जबकि उलट सफाई यह है कि बेहद जरुरत है जमीनी कार्य करने की ।
अशफाक को हिन्दू आबादी में घर नहीं मिलता और मनोज के घर में दाल की कीमत इतनी बढ़ गयी है कि आज दाल कम… पानी ज्यादा है…, उनका मालिक भ्रष्टाचार से परेशान है, टेक्स की मार उसे खाये जा रही है, बच्च्वे स्कूल में अध्ययन कर रहे हैं, उनकी फीस उसे ज्यादा लग रही है … वामपंथी और शामपंथी उनके लिए कुछ नहीं कर रहे हैं तीनों को पता नहीं कि रोटी, भूख और घर पर कविताएं लिखी जा रही हैं और लिखे जाने का असर इन पर नहीं है … उसकी वजह सिर्फ यह है कि लिखने वालों का समाज से कोई लेना देना नहीं है । समस्याओं को शब्दों की शक्ल देकर नीचे अपना नाम छपवाकर ये समाज में महत्वपूर्ण हो गये हैं । इनकी किताबें बिकती नहीं है । कुछ लोग सिर्फ अपनी लाइब्रेरी में इनकी किताबों को सजावट की तरह रखते हैं । जब इस तरह के खेल चलते हैं तो दिल से जो जज्बाती लोग होते हैं, वे भी इसका शिकार हो जाते हैं और कभी–कभी इसमें शरीक भी हो जाते हैं, उनका सिर्फ इस्तेमाल होता है ।
उर्दू के बड़े शायर रघुपति सहाय अपनी जवानी के दिनों में कांगे्रस के अण्डर सेके्रटरी हो गये थे और एक वर्ष से अधिक जेल में रहे थे । मगर आजादी के पश्चात् उन्होंने कभी भी कांगे्रस का झंडा नहीं उठाया । धर्म निरपेक्षता के शब्द के आवरण में जो लोग छिपे हैं उनकी सफाई को जानने के लिए यह काफी है कि तत्कालीन वाईसराय लार्ड वेवल से शिमला में बात करते हुए कांग्रेस की सदस्यता की संख्या के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना ने उसे हिन्दुओं की पार्ट कहा था और बाद में उन्होंने मुसलमान की समस्याओं को अनदेखा करने का इल्जाम इसी पार्ट पर लगाते हुए मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण कर ली थी । तब कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने यह नहीं कहा था कि हम धर्म निरपेक्ष हैं और हम सदस्यता नहीं धर्म निरपेक्षता के आधार पर मुसलमानों को अपने साथ रखेंगे । सत्ता को हासिल करने के इस संघर्ष में जिन लोगों ने नेतृत्व किया था वो चाहे नेहरु हों या जिन्ना हों, धर्म से उनका कोई ताल्लुक नहीं था यह सर्वविदित सत्य है और सबको पता है। हुकूमत मिलते ही दोनों ने धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़ लिया और उसके प्रचार प्रसार के नतीजे में हिन्दुस्तान का मुसलमान कांग्रेस के वोट बैंक में तब्दील हो गया, उसके धर्मनिरपेक्ष नेता मौलाना आज़ाद, जाकिर हुसैन वतन से प्यार करने वाले मुसलमानों को यह समझाने में कामयाब हो गये कि धर्मनिरपेक्ष देश का निर्माण हो रहा है, यहां अब धर्म कोई मसला नहीं है । अगर गाय इस देश का बड़ा इश्यू है तो इसका समझना भी जरुरी होगा कि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय और बछड़ा था और वह स्पष्ट रुप से इंगित करता था कि माता के रुप में स्थान रखने वाली गाय हमारा चुनाव चिन्ह है, हमें वोट दीजिए ।
कांगे्रसी थोड़ा इतिहास में झांके तो उनको पता चलेगा कि कभी शाहबानो की शक्ल में और कभी राम मंदिर का टला खुलवाने की शक्ल में देश को क्या–क्या दिया । ये जो गाय का खेल है वह बड़ा पुराना खेल है । इसको कैसे–कैसे भुनाया जाता है इसका एक उदाहरण इस तरह है कि मध्यप्रदेश के एक पूर्व आयएएस अधिकारी मुख्य सचिव के पद से पदमुक्त होते ही भाजपा के सदस्य बन गये और अपनी साफ सुथरी छवि को भुनाने के लिए इसी पार्ट के भोपाल संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के उम्मीदवार हो गये । कांग्रेस को लगा कि भैया एक तो मुख्य सचिव और ऊपर से कायस्थ, ये जो वोटों का समीकरण है इनके पक्ष में है । तो उसने भी मुस्लिम वोटों के आधार पर अपना ट­म्प कार्ड फैंका और भारतीय टीम के पूर्व कप्तान और भोपाल के वारिस–ए–नवाब मंसूर अली खां पटौदी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया । तब भाजपा ने बड़े जोरो से एक नारा दिया ”गाय हमारी माता है, नवाब इसको खाता है” और नवाब साहब जो कि अपने जमाने में पूरे देश के शहरियों के क्रिकेट हीरो थे जिन्होंने ने कभी हिन्दू कहा न कभी मुसलमान कहा, अपनी एक आंख गंवाकर भी देश के लिए खेलते रहे पर भारतीयों के क्रिकेट प्रेम के बावजूद भी इस नारे की बदौलत भारी मतों से चुनाव हार गये। यह उदाहरण साबित करता है कि गाय से हमारा रिश्ता जज्बाती है, क्योंकि हम मूल रुप से जज्बाती प्रकृति के लोग हैं। इसलिए कांग्रेस कभी उसको अपना चुनाव चिन्ह बनाती है और भाजपा उसके मां होने की याद याद दिलाती है ।
मुसलमान क्या खाते हैं ? क्या नहीं खाते हैं ? हिन्दू क्या खाते हैं ? क्या नहीं खाते हैं ? पसंद और नापसंद अपना निजी मामला है । उसे समाज का मसला बनाने के लिए श्रीनगर में एक विधायक रशीद इंजीनियर मुसलमानों की लम्बी हुकूमत और इतिहास की परंपरा में पहली बार सिर्फ मुसलमान होने के नाते बीफ पार्ट देते हैं । ताकि कुछ लोगों को यह बताया जा सके कि खाना भूख के लिए नहीं सियासत और वोट के लिए जरुरी है फिर यह एक खेल है जिसे मैं तुम्हारी तरफ से होकर खेलुँगा और दूसरे दूसरी तरफ से खेलेंगे। मेरी कौम के लोग इन जज्बातों से खुश होंगे। नतीजे में दिल्ली में दो लोग उन पर स्याही फैंक देते हैं। दोनों का काम हो गया… तो ये सुर्खियां बटोरकर हम अपने–अपने हलकों के हीरो हो गये। जो सारा माहौल है अगर इसे गहराई से देखा जाये तो नतीजे में तस्वीर बनती है कि मैं इन सबसे हटकर हूँ, जो आम शहरी है वो मैं नहीं हूँ… मैं तो खास हूँ… और मुझे आप खास मान लीजिये। पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह राष्ट्रपति जियाउल हक्क ने एक बार अनौपचारिक बातचीत में यह कहा था कि तुर्क, मिश्र या ईरान अपने आपको मुस्लिमदेश न माने तो भी वे तुर्क, मिश्र और ईरान ही रहेंगे।
अगर पाकिस्तान ने ऐसा कहना बन्द कर दिया तो वह भारत हो जावेगा। बलात्कार के इल्जाम में अब तक जमानत भी हासिल न कर पाने वाले आसाराम बापू की कथा सुनने के लिए भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी अपने पूरे होशो हवास में चले गये थे और आम भक्तों के बीच बैठकर उनके उपदेशों को ग्रहण किया था … तो ये जनता के साथ जो खेल है पूरी तरह जज्बाती है । जियाउल हक्क खेल रहे हैं मुसलमानों के साथ, तो कोई खेल रहा है हिन्दुओं के साथ। दुर्भाग्य से यह बीमारी साहित्यकारों में भी प्रवेश कर गई है, मेरा पाने और लौटाने वालों से अनुरोध है कि इस जज्बाती खेल में वे बिल्कुल शिरकत न करें, दोनों राजनैतिक दलों के चेहरे एक सरीखे हैं । जज्बातों को वोट में तब्दील करने की हुनरमंदी में दोनों एक से हुनरमंद हैं । जो मुसलमान हैं वो भी अब तक हिन्दू जात ओढ़े हुए हैं । कोई जुलाहा है, कोई रंगरेज है, कोई पठान है, कोई कसाई है, वे सिर्फ धर्म से मुसलमान हुए हैं। हिन्दु भी इसी तरह धोबी, हरिजन, ब्राम्हण, अगढ़े और पिछड़ों की तरह अपनी–अपनी जाते ओढ़े हुए हैं, सिर्फ धर्म से हिन्दू हुए हैं। धर्म के तमाम पैगम्बर, गुरु, चाहे वे गौतम बुद्ध हों, गुरु नानक या ईसा मसीह हो, आदि गुरु शंकराचार्य हों सभी ने कहा है कि ईश्वर का कोई स्वरुप नहीं है वो निराकार है और वे हर मनुष्य में हैं हर पल हर क्षण प्रकृति में हैं।
समाज में अपना स्थान सम्मानजनक बनाने के लिए उनके उपदेशोंको कुचलते हुए लोगों में उनके मठ मंदिर और न जाने क्या–क्या बना डालें हैं। धर्म की स्थिति भी यही है और जरुरत इस समस्या को मार देने की है। जमीनी काम करने वाले हमेशा उग्रपंथियों के शिकार हुए हैं, क्योंकि उनके जमीनी काम से लोग सीधे प्रभावित होते हैं और वोटों के खेल में ये सबसे बड़ा रोड़ा है। ये जो तमाम लोग हैं जो सुर्खियां बटोरने के लिए और कुछ अपने जज्बातों के कारण इस खेल में शरीक हुए हैं। वे अगर जमीनी कार्य करेंगे तो समाज की कुछ शक्ल बदलेगी। अशफाक भी हिन्दू बस्ती में रह सकेगा और मनोज की हण्डी में दाल ज्यादा और पानी कम हो जावेगा। मेहरबानी करके सुर्खियाँ बटोरने के लिए समाज पर छा जाने के लिए अपनी बातें समाज के मुँह में मत डालिये, साहित्य को इस खेल से दूर रखिये, भाषाओं को इससे दूर रखिये । कल जब भविष्य इस गुजरते हुए इतिहास को पढ़ेगा तो निश्चित ही वह हमसे ज्यादा समझ वाली पीढ़ी होगी तो वो अपने पुरखों के कारनामों पर अफसोस करेंगी । साहित्य के कारण ही आज भी भारत नास्तिक, धार्मिक, अधार्मिकवाद और विचार धाराओं के तूफान को भी झेलकर खड़ा है । साहित्य समाज का आइना है और आइना कभी झूठ नहीं बोलता । शोहरतें बटोरने, सुर्खियां पाने का साधन साहित्य को मत बनाइये, अपने पूर्वजों पर गौर करें जमीन के साथ जुड़ें और हकीकत की तस्वीर बदलने की कोशिश करें। आम आदमी की आवाज साहित्य के जरिये ही सत्ता तक पहुंच पाई है और शासकों व शोषकों को बार–बार अपने इरादे बदलने पर मजबूर करती रहे है, इसे उसी आवाज को बुलन्द करने का हथियार बनाये रखें।




Friday, December 18, 2015

डॉ खुर्शीद अहमद अंसारी की दो कवितायें ।

 

डॉ खुर्शीद अहमद अंसारी की दो कवितायें  ।

1-माँ
(आज फिर याद बहुत आई माँ)
तेरी दुआओं के साये,इस वहशत मे इक नूर से हैँ .
तेरे क़दमों मे जन्नत है, जो सबकी इक ख्वाहिश सी है
मैं क्या जानूँ जन्नत' दोज़ख सब कुछ तेरे नाम के बाद
तू जननी है, तू ही ममता ,तू दुनिया कि हर नैमत है
तेरे सदक़े यह जान मेरी , तेरे कदमोँ मे सब खुशियां
तू काश अगर जिन्दा होती मै फ़िर से तेरे कांधो पर
सर रख लेता और सो जाता !
मैं इक सदी से सोया कहां,
तुम फिर आतीं मै सो जाता

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2-ज़ीस्त

कुछ तो तुझको मनाने में गुज़री
और कुछ रूठ जाने में गुज़री
ज़िन्दगी तू बहुत कमीनी है
ज़िम्मेदारी ,निभाने में गुज़री
लम्हा ए इल्तिफ़ात की, तो न पूछ
जोड़ने और घटाने में गुज़री